कर्ण और अर्जुन के पिछले जन्म की कथा
कर्ण और अर्जुन के पिछले जन्म की कथा का वर्णन पद्म पुराण मे आता है एक बार भगवान ब्रह्मा और महादेव के बीच युद्ध
होता है, महादेव ब्रह्माजी के पांचवें सर को काट देते है। क्रोधित ब्रह्मदेव
के शरीर से पसीना निकलता है, और पसीने से एक वीर योध्धा उत्पन्न होता है। जो स्वेद(पसीने)
से जन्मा इसलिए स्वेदजा के नाम से जाना जाता है। स्वेदजा पिता ब्रह्मा के आदेश से
महादेव से युद्ध करने जाता है। महादेव भगवान विष्णु के पास क्रोधित ब्रह्मा द्वारा
जन्म लेने वाले स्वेदजा का कुछ उपाय बताने को कहते हैं। भगवान विष्णु अपने रक्त से
एक वीर को जन्म देते है। रक्त से जन्मा इसलिए उसे रक्तजा के नाम से जाना जाता है।
स्वेदजा 1000 कवच के साथ जन्मा था और रक्तजा 1000 हाथ और 500 धनुष के साथ ।
भगवान ब्रह्मा , विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए थे इसलिए स्वेदजा भी भगवान विष्णु
का ही अंश था। स्वेदजा और रक्तजा में भयंकर युध्ध होता हे। स्वेदजा, रक्तजा के 998 हाथ कट देता है और
500 धनुष तोड़ देता हे। वही रक्तजा स्वेदजा के 999 कवच तोड़ देता है।
रक्तजा बस हारने ही वाला होता है। भगवान वि ष्णु समझ जाते हैं की रक्तजा स्वेदजा
से हार जाएगा। इसलिए वे उस युद्ध को शांत करवाते हैं। स्वेदजा दानवीरता दिखाते हुए
रक्तजा को जीवनदान देता है। भगवान विष्णु स्वेदजा की जवाबदेही सुर्यनारायण को सौंपते
है, और रक्तजा की इंद्रदेव को। वह इंद्रदेव को वचन देते है की अगले
जन्म में रक्तजा अपने प्रतिद्वंदी स्वेदजा का वध अवश्य करेगा। द्वापर युग में रक्तजा
अर्जुन और स्वेद्जा कर्ण के रुप में जन्म लेते हैं और अर्जुन अपने सबसे महान प्रतिद्वंदी
कर्ण की युद्ध के नियमों के विरुद्ध हत्या करते हैं।
कर्ण की मृत्यु के कारक
कर्ण की मृत्यु के सम्बन्ध में निम्नलिखित कारक गिनाए जा सकते हैं:
१. कर्ण की मृत्यु का सर्वप्रथम कारक तो
स्वयं ऋषि दुर्वासा ही हैं। कुन्ती को यह वरदान देते समय की वह किसी भी देव का
आह्वान करके उनसे सन्तान प्राप्त कर सकती है, इस वरदान के परिणाम के बारे में नहीं
बताया। इसलिए, कुन्ती उत्सुकता वश सूर्यदेव का आह्वान करती है और यह ध्यान नहीं
रखतीं की विवाहपूर्व इसके क्या परिणाम हो सकते हैं और वरदानानुसार सूर्यदेव कुन्ती
को एक पुत्र देते हैं। लेकिन लोक-लाज के भय से कुन्ती इस शिशु को गंगाजी में बहा
देतीं है। तब कर्ण, महाराज धृतराष्ट्र के सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा को मिलता है
वे उसका लालन-पालन करते है और इस प्रकार कर्ण की क्षत्रिय पहचान निषेध कर दी जाती
है। कर्ण , हस्तिनापुर के सिंहासन का वास्तविक अधिकारी था, ना कि युधिष्ठिर या
दुर्योधन, लेकिन यह कभी हो ना सका क्योंकि उसका जन्म और पहचान गुप्त रखे गए।
२. देवराज इन्द्र जिन्होंने बिच्छू के रूप में कर्ण की क्षत्रिय पहचान
उसके गुरु के सामने ला दी और अपनी पहचान के सम्बन्ध में अपने गुरु से मिथ्याभाषण
के कारण (जिसके लिए कर्ण स्वयं दोषी नहीं था क्योंकि उसे स्वयं अपनी पहचान का
ज्ञान नहीं था) उसके गुरु ने उसे सही समय पर उसका शस्त्रास्त्र ज्ञान भूल जाने का
श्राप दे दिया।
३. गाय वाले ब्राह्मण का श्राप की जिस प्रकार उसने एक असहाय और
निर्दोष पशु को मारा है उसी प्रकार वह भी तब मारा जाएगा जब वह सर्वाधिक असहाय होगा
और उसका ध्यान अपने शत्रु से अलग किसी अन्य वस्तु पर होगा। इसी श्राप के कारण
अर्जुन उसे तब मारता है जब उसके रथ का पहिया धरती में धँस जाता है और उसका ध्यान
अपने रथ के पहिए को निकालने में लगा होता है।
४. धरती माता का श्राप की वह नियत समय पर उसके रथ के पहिए को खा
जाएगीं और वह अपने शत्रुओं के सामने सर्वाधिक विवश हो जाएगा।
५. भिक्षुक के भेष में देवराज इन्द्र को, कर्ण द्वारा अपनी
लोकप्रसिध्ध दानप्रियता के कारण अपने शरीर पर चिपके कवच कुण्डल दान में दे देना।
६. 'शक्ति अस्त्र'
का घटोत्कच पर चलाना, जिसके कारण वह
वचनानुसार दूसरी बार इस अस्त्र का उपयोग नहीं कर सकता था।
७. माता कुन्ती को दिए वचनानुसार 'नागास्त्र' का दूसरी बार
प्रयोग ना करना।
८. माता कुन्ती को दिए दो वचन।
९. महाराज और कर्ण के सारथी ,पाण्डवों के
मामा शल्य, जिन्होंने सत्रहवें दिन के युद्ध में अर्जुन की युद्ध कला की
प्रशंसा करके कर्ण का मनोबल गिरा दिया।
१०. युध्ध से कुछ दिन पूर्व जब कर्ण को यह ज्ञात होता है कि पाण्डव
उसके भाई हैं तो उनके प्रति उसकी सारी दुर्भावना समाप्त हो गई, पर दुर्योधन के
प्रति निष्ठ होने के कारण वह पाण्डवों (अर्थात अपने भाईयों) के विरुध्ध लड़ा। जबकि
कर्ण की मृत्यु होने तक पाण्डवों को यह नहीं पता था की कर्ण उनका ज्येष्ठ भाई है।
११. सूर्यदेव जो सत्रहवें दिन के युद्ध में तब अस्त हो गए जब कर्ण के
पास अर्जुन को मारने का पूरा अवसर था।
१२. द्रौपदी का अपमान करना।
१३. श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को यह आदेश देना की वह कर्ण का वध करे
जबकि वह अपने रथ के धँसे पहिए को निकाल रहा होता है।
१४. भीष्म पितामह,
क्योंकि उन्होंने अपने सेनापतित्व में
कर्ण को लड़ने की आज्ञा नहीं दी।

उम्दा जानकारी8
ReplyDeleteधन्यवाद पवनजी
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