भीष्म
का
असली
नाम
देवव्रत
था
वो
, देवी गंगा(नदी) और शांतनु
के
पुत्र
थे
. गंगा
, निरंतर प्रवाहित
रहने
के
कारण
शांतनु
के
साथ
नहीं
रह
सकती
थी .शांतनु अकेले थे .उन्होंने एक दिन सत्यवती को देखा जो अत्यंत रूपवती थी ,भीष्म के पिता शांतनु को सत्यवती से प्रेम हो गया था अतः शांतनु
सत्यवती
से विवाह
करना
चाहते
थे
, किन्तु सत्यवती
ने
शांतनु
से
विवाह
करने
के
लिए
एक
शर्त
रखी
.
भीष्म अत्यंत
ही
पराक्रमी
थे
और
सत्यवती
ये
बात
जानती
थी
, उसने शांतनु
से कहा की
आपका
जयेष्ठ पुत्र
होने
के
कारण
हस्तिनापुर
की
गद्दी
पर
उसी
का
हक
होगा
किन्तु मैं चाहती
हूँ
की
मेरा ही पुत्र
हस्तिनापुर
का
राज्य संभाले,
और
ये
तभी
संभव
है
जब
आप
भीष्म
को
सदा
के
लिए
त्याग
दें
. सत्यवती की
बातें
सुनकर
शांतनु
अत्यंत
विचलित
हो
गये
और
अवसाद
में
रहने
लगे
. भीष्म अपने पिता को
ऐसी
अवस्था में नहीं
देख
पाए
और
उन्होंने
अपने
पिता
से
, इसका कारण पूछा
, बहुत प्रयास
करने
के
बाद
शांतनु
ने
भीष्म
को
ये
बात
बतायी
.
ये सुनकर
भीष्म
ने
सत्यवती
के
सम्मुख
ये
प्रतिज्ञा
ली
कि
वो
आजीवन
ब्रह्मचारी
रहेंगे
और
हस्तिनापुर
के
सिहांसन
के
संरक्षक
बन
सत्यवती
के
पुत्र
और
उनके
कुल
की
आजीवन
रक्षा
करेंगे.तब जाकर
सत्यवती
ने
शांतनु
से
विवाह
किया
.
शिक्षा और क्षमता
भीष्म
ने
भगवान्
परशुराम
जिन्हें
भगवान्
शिव
का
अंश माना
जाता
है
, से शिक्षा
ली
थी
. भीष्म परशुराम
जी
के
सबसे
योग्य
और
पराक्रमी
शिष्य
थे
, जिन्हें पूरे
विश्व
में
कोई
भी
परास्त
नहीं
कर
सकता
था
. एक बार भीष्म
और
परशुराम
के
मध्य
भी
युध्ध
हुआ
किन्तु
उसका निर्णय
नहीं
हो
सका
, पृथ्वी पर
जनहानि
को
बचाने
के
लिए
भगवान्
शिव ने इस
युध्ध
को रोक दिया
.महाभारत के
युध्ध
में
भी
जब
तक
भीष्म सेनापति
थे
पांडवों
को
हर
दिन
हार
का
भय
सताता
था
, और अंत में
स्वयं
भीष्म
ने
अर्जुन
को
अपनी
मृत्यु
का
मार्ग
बताया
था
.
भीष्म द्वारा किये गए अपराध
१)काशी
नरेश की
पुत्रियों का
अपहरण
सत्यवती
ने
काशी
नरेश
की
पुत्री
से
विवाह
का
प्रस्ताव
भेजा
जिसे
काशी
नरेश
ने
ठुकरा
दिया
. सत्यवती प्रस्ताव
के
ठुकराए
जाने
से
क्रोधित
हो
गयी
और
उसने
भीष्म
कोआज्ञा
दी
की
काशी
नरेश
की
सभी
पुत्रियों
को
उठाकर
ले
आओ
, और भीष्म
ने
अपनी
माता
के
आदेश
अनुसार
काशी
पर
धावा
बोलकर
काशी
नरेश
की
तीनों
पुत्रियों
अम्बा,
अम्बिका,
और
अम्बालिका
का
अपहरण
कर
लिया
और हस्तिनापुर ले
आये
. बाद में काशी
नरेश
के
निवेदन
पर
एक
पुत्री
अम्बा
को
छोड़
दिया
मगर
, अम्बिका और
अम्बालिका
से
जबरन
विचित्रवीर्य
का
विवाह
करवा
दिया.
महर्षि दधिची की कथा
महर्षि दधिची की कथा
२) धृतराष्ट्र
का गांधारी
से विवाह
धृतराष्ट्र जन्म
से
ही
अंधे
थे
और
उनका
विवाह
नहीं
हो
रहा
था
भीष्म
ने
गंधार
पर
हमला
कर
गंधार
नरेश
को
परास्त
कर
दिया
और
राज्य
छोड़ने
के
बदले
गांधारी
के
साथ
धृतराष्ट्र
का
विवाह
करवाया
, गांधारी ने
अपनी
आँखों
पर
पट्टी
बांध
ली
जब
उन्हें
ज्ञात
हुआ
की
उन्हें
एक
अंधे
से
विवाह
करना
पड़ेगा.
इसी
अपमान
का
बदला
लेने
के
लिए
गंधार
पुत्र
,शकुनी हस्तिनापुर
आता
है
, महाभारत युध्ध
की
भूमिका
रखता
है
.
३) जब
भीष्म
शर
शय्या
पे
पड़े
होते
हैं
तो
वो
कृष्ण से
पूछ्ते
हैं
कि
किस
पाप
के
फलस्वरूप
उन्हें
शर
शय्या
पर
सोना पड़
रहा
है
, तब कृष्ण बताते
है
, १०१ वें जन्म
में
आप
राजकुमार
थे
और
घोड़े
पर
सवार
होकर
शिकार
को
जा
रहे
थे
तब
एक
करकैंटा
, आपके सम्मुख
घोड़े
पर आकर गिरा
जिसे आपने
अपने
बाण
से
हटाकर
फेक दिया जो सीधे जाकर बेर के काटों
पर
जा
गिरा
और
कांटे
उसकी
पीठ
में
घुस
गये
, वो जितना
बाहर
निकलने
की
कोशिश
करता
वो
उतना
ही
कांटो
से
छलनी
होता गया , अठ्ठारह दिन तक
वो
तडपता
रहा
और
श्राप
देता
रहा
कि.’
हे युवराज
जिस तरह
मैं तड़प
तड़प कर
मर
रहा हूँ
तुम भी
ऐसी ही
मृत्यु को
प्राप्त होना
‘.
भीष्म
द्वारा कितने
भी पाप
किये गए
हों किन्तु उन्होंने
सत्यवती को
दी हुई
प्रतिज्ञा का
पालन किया
. इसीलिए भीष्म
प्रतिज्ञा को उदाहरण माना जाता है
.भीष्म आजीवन
हस्तिनापुर सिहांसन
के संरक्षक
बने रहे
और उन्होंने
धृतराष्ट्र को
समझाने के
कई बार
प्रयास किये
ताकि महाभारत
का युध्ध
टाला जा
सके किन्तु
धृतराष्ट्र पुत्र
मोह
के
कारण
नहीं
माने
और
महाभारत
का
युध्ध
हुआ
.
भीष्म
महाभारत
युध्ध
के
ना
ही
नायक
थे
और
ना
ही
खलनायक
, किन्तु अपनी
प्रतिज्ञा
से
बंधकर
उन्होंने
अन्याय
का
साथ
दिया
.

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