लोकतंत्र की परिकल्पना करते समय किसी ने भी इसके दूसिकरण के विचार नहींक्या होगा , अन्यथा इस व्यवस्था के दुसपरिणामो का समाधान भी सोचा होता। आज दिल्ली ने जो एक उदाहरण प्रस्तुत किया है लोकतंत्र का वो बहुत सराहनीय है। लेकिन क्या कुछ ईमानदार लोगों के राजनीति में प्रवेश मात्र से लोकतंत्र कि दशा बदल सकती है , इस बात को मान लेना कुछ मुस्किल लगता है। जनसंघ कि स्थापना भी कुछ इसी तरह के लोगों ने कि थी , जो राजनीति को एक नयी दिशा देना चाहते थे , किन्तु एक लम्बे समय तक किसी भी विचारधारा को पकडे रखना अपने आप मैं एक चुनौती है। जब संविधान कि रचना कि गयी तब कई सारे कानों बनाये गए , पर आने वाली सरकारों ने अपनी सुविधा के अनुरूप संविधान में परिवर्तन किये। आज आम आदमी पार्टी भी कुछ अच्छी विचारधारा के साथ राजनीति में आयी है और आम आदमी ये उम्मीद करता है ,वो इस विचारधारा को आगे लेकर चल पाएंगे। लेकिन क्या पुरे देश कि जनता दिल्ली कि जनता कि तरह जागरूक है , ये एक बड़ा प्रश्न है। दिल्ली मैं कई राज्यों के लोग , अच्छी शिक्षा के सात आकर रहते हैं , आबादी इतनी घनी है कि आप अधिक से अधिक लोगों से संपर्क कर सकते है, किन्तु अन्य राज्यों मैं जहाँ जनसँख्या का घनत्व इतनअ अच्छा नहीं क्या , घर घर जाकर लोगों को जागरूक करना मुमकिन है जैसा कि डेल्ही मैं किया गया। क्या मोबाइल के माध्यम से मिजोरम, आसाम , तमिलनाडु या उडीशा के लोगों का मन बदला जा सकता है , ऐसे ही कई सवाल है जिनके जवाब आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर राजनितिक भविस्य का निर्धारण करेंगे। आज हर एक युवा अरविन्द केजरीवाल का प्रसंशक है , चाहे वो किसी भी पर्य का मतदाता रहा हो। क्यों किसी पर सवाल उठाना बहुत ही आसान है , और उन सवालों का जवाब देना उतना ही मुश्किल। कुछ समय पहले जो राजनेता कहते थे कि अगर जनता आपके के साथ है तो आप चुनाव लड़के देखिये आज मानने को बाध्य हैं कि जनता केवल सही लोगों का साथ देती है , लेकिन सही लोगों को चुनने का मौका मिलना चाहिए। अब तक समझदार लोग भारतीय जनता पार्टी को एक परिवर्तनकारी पार्टी मानते थे लेकिन आज उन्हें बीजेपी से भी बेहतर विकल्प दिखने लगा है, यही सही समय जब बीजेपी और कांग्रेस को भी साफ़ सुथरी राजनीति का परिचय देना चाहिए अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब ये दोनों रास्ट्रीय पार्टियां , राज्य स्तरीय पार्टियों मैं तब्दील हो जाएंगी। एक और प्रश्न जो मेरे मस्तिष्क मैं आता है वो राजनीतिक चंदे का , आम आदमी पार्टी का पहला चुनाव लोगों के द्वारा दिए गए चंदे से लड़ा गया और ये चंदा लोगों ने इसलिए दिया ताकि वो एक परिवर्तन देखें और जब परिवर्तन देख लेंगे तो क्या फिर वो चंदा देंगें और अगर नहीं देंगे तो चुनाव का खर्च कहाँ से आयेगा। केवल दिल्ली मैं चुनाव लड़ने में २० करोड़ का खर्च हुआ २० राज्यों मैं चुनाव लड़ने का खर्च ४०० करोड़ , क्या इतना चंदा जनता बार बार दे पायेगी, अगर नहीं तो इन खर्चो के लिए आप पार्टी के कार्यकर्ता गलत तरीकों का इस्तेमाल नहीं करेंगे?? खैर जो भी हो जिस कार्य को करने मैं किसी पार्टी को १५ से २० वर्ष लग जाते हैं वो आप पार्टी ने एक वर्ष में ही कर दिखाया जो वाकई सराहनीय है और इसमें रामदेव, अन्ना हजारे, जैसे लोगों के योगदान को अनदेखा कर देना गलत होगा। आज दिल्ली कि जनता का पूर्ण समर्थन आप पार्टी के साथ है, क्योंकि वो सोचती है कि ये पार्टी उनकी सारी समस्याओं का समाधान करने में सक्षम है। लेकिन अगर दिल्ली मैं पुनः मतदान होता है तो सम्भावना है कि आप पार्टी ही बहुमत मैं आएगी और इसके बाद आप के सामने असली चुनौती आएगी और वो है सिस्टम को सुधारने की। केवल सही नीतियां बना देने से ही बदलाव नहीं आता , बल्कि उनके सही तरह से लागू करने से आता है। आज गुजरात में नरेंद्र मोदी जैसा कड़ा प्रशासक है, जिससे सभी सरकारी कर्मचारी डरते हैं, फिर भी सिस्टम कि कमजोरियों का फायदा तो लोग उठा ही लेते हैं , मोदीजी ने कई नयी नीतियां लागू कि हैं लेकिन फिर भी उन नीतियों का अनुमानित लाभ नहीं हुआ है। अरविन्द केजरीवाल के सामने एक चुनौती और है और वो है व्यापारिक लॉबी से सम्बन्धों को बनाये रखना।
शुभ रात्रि।
शुभ रात्रि।

