Sunday, 21 October 2018

सुर्यपुत्र कर्ण, एक योध्धा (भाग -२)

महादानी कर्ण की उदारता

कर्ण एक महादानी था . अंगदेश का राजा बनने के बाद उसने ये घोषणा की , कि प्रातःकाल जब वह सूर्यदेव की पूजा करता है, उस समय यदि कोई उससे कुछ भी मांगेगा तो वह मना नहीं करेगा और मांगने वाला कभी खाली हाथ नहीं लौटेगा। कर्ण की इसी दानवीरता का महाभारत के युद्ध में इन्द्र और माता कुन्ती ने लाभ उठाया। 

महाभारत के युद्ध के बीच में कर्ण के सेनापति बनने से एक दिन पूर्व इन्द्र ने कर्ण से साधु के भेष में उससे उसके कवच-कुण्डल माँग लिए, क्योंकि यदि ये कवच-कुण्डल कर्ण के ही पास रहते तो उसे युद्ध में परास्त कर पाना असम्भव था और इन्द्र ने अपने पुत्र अर्जुन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कर्ण से इतना बडी़ भिक्षा माँग ली लेकिन दानवीर कर्ण ने साधु भेष में देवराज इन्द्र को भी मना नहीं किया और इन्द्र द्वारा कुछ भी वरदान माँग लेने पर देने के आश्वासन पर भी इन्द्र से ये कहते हुए कि "देने के पश्चात कुछ माँग लेना दान की गरिमा के विरुद्ध है" कुछ नहीं माँगा।
इसी प्रकार माता कुन्ती को भी दानवीर कर्ण द्वारा यह वचन दिया गया कि इस महायुद्ध में उनके पाँच पुत्र अवश्य जीवित रहेंगे और वह अर्जुन के अतिरिक्त और किसी पाण्डव का वध नहीं करेगा। और उसने वही किया , कर्ण ने अर्जुन के वध के लिए देवराज इंद्र से इंद्रास्त्र भी माँगा था।
कर्ण की दानवीरता की परीक्षा कृष्ण ने तब ली जब कर्ण मरणासन्न अवस्था में युध्ध के मैदान में पड़ा हुआ था . कृष्ण ने एक साधू का रूप धारण किया ओर मृत्युशय्या पे पड़े कर्ण से भिक्षा मांगी , पहले तो कर्ण ने कहा  कि मैं इस अवस्था मैं क्या दे सकता हूँ जब साधू रूप में कृष्ण जाने लगे तो करना बोला ,एक छण रुकिए, और कर्ण ने एक पत्थर उठाया और अपने मुह में लगे सोने के दांत को तोड़कर साधू को दान दिया , तब कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आ गये और बोले तुम धन्य हो कर्ण , तुम्हें सदैव एक महादानी के रूप में स्मरण किया जाता रहेगा .

कर्ण और अर्जुन की प्रतिद्वन्दिता

कर्ण द्रौपदी के स्वयंवर में एक विवाह-प्रस्तावक था। अन्य प्रतिद्वन्दियों के विपरीत, कर्ण धनुष को मोड़ने और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा पाने में समर्थ था, पर जैसे ही वह लक्ष्य भेदन के लिए तैयार हुआ, तब श्रीकृष्ण के संकेत पर, द्रौपदी ने कर्ण को सूत-पुत्र बोलकर उसे ऐसा करने से रोक दिया। पाण्डव भी वहाँ ब्राह्मण के भेष में उपस्थित थे जो उस समय अज्ञातवास पर थे । अन्य राजकुमारों और राजाओं के असफल रहने पर अर्जुन आगे बढ़ा और सफलतापूर्वक मछली की आँख का भेदन किया और द्रौपदी का हाथ जीत लिया।जब बाद में अर्जुन की पहचान उजागर हुई तो कर्ण की प्रतिद्वन्द्विता की भावना और गहरी हो गई।

कर्ण के सैन्य अभियान 

पाण्डवों के वनवास के दौरान, कर्ण, दुर्योधन को पृथ्वी का सम्राट बनाने का कार्य अपने हाथों में लेता है। कर्ण द्वारा देशभर में सैन्य अभियान छेड़े गए और उसने राजाओं को परास्त कर उनसे ये वचन लिए की वह हस्तिनापुर महाराज दुर्योधन के प्रति निष्ठावान रहेंगे अन्यथा युद्धों में मारे जाएगें। कर्ण सभी लड़ाईयों में सफल रहा। महाभारत में वर्णन किया गया है कि अपने सैन्य अभियानों में कर्ण ने कई युद्ध छेड़े और असंख्य राज्यों और साम्राज्यों को आज्ञापालन के लिए विवश कर दिया जिनमें हैं - कम्बोज, शक, केक‍य, अवन्तय, गन्धार, माद्र, त्रिगत, तंगन, पांचाल, विदेह, सुह्मस, अंग, वांग, निशाद, कलिंग, वत्स, अशमक, ऋषिक और बहुत से अन्य जिनमें म्लेच्छ और वनवासी लोग भी हैं।

श्री कृष्ण और कर्ण 

दुर्योधन के साथ शान्ति वार्ता के विफल होने के पश्चात, श्रीकृष्ण, कर्ण के पास जाते हैं, जो दुर्योधन का सर्वश्रेष्ठ योद्धा है। वह कर्ण का वास्तविक परिचय उसे बतातें है, कि वह सबसे ज्येष्ठ पाण्डव है और उसे पाण्डवों की ओर आने का परामर्श देते हैं। कृष्ण उसे यह विश्वास दिलाते हैं कि चुँकि वह सबसे ज्येष्ठ पाण्डव है, इसलिए युधिष्ठिर उसके लिए राजसिंहासन छोड़ देंगे और वह एक चक्रवती सम्राट बनेगा।
पर कर्ण इन सबके बाद भी पाण्डव पक्ष में युद्ध करने से मना कर देता है, क्योंकि वह अपने आप को दुर्योधन का ऋणि समझता था और उसे ये वचन दे चुका था कि वह मरते दम तक दुर्योधन के पक्ष में ही युद्ध करेगा। वह कृष्ण को यह भी कहता है कि जब तक वे पाण्डवों के पक्ष में हैं जो कि सत्य के पक्ष में हैं, तब तक उसकी हार भी निश्चित है। तब कृष्ण कुछ उदास हो जाते हैं, लेकिन कर्ण की निष्ठा और मित्रता की प्रशंसा करते हैं और उसका यह निर्णय स्वीकार करते हैं और उसे ये वचन देते हैं कि उसकी मृत्यु तक वह उसकी वास्तविक पहचान गुप्त रखेंगे।

कवच कुंडल की छति 

अर्जुन के पिता और देवराज इन्द्र को इस बात का ज्ञान होता है कि कर्ण युद्धक्षेत्र में तब तक अपराजेय और अमर रहेगा जब तक उसके पास उसके कवच और कुण्डल रहेंगे, जो जन्म से ही उसके शरीर पर थे। इसलिए जब कुरुक्षेत्र का युद्ध आसन्न था, तब इन्द्र ने यह ठानी कि वह कवच और कुण्डल के साथ तो कर्ण को युद्धक्षेत्र में नहीं जाने देंगे। उन्होनें ये योजना बनाई की वह मध्याह्न में जब कर्ण सूर्य देव की पूजा कर रहा होता है तब वह एक भिक्षुक बनकर उससे उसके कवच-कुण्डल माँग लेंगें। सूर्यदेव इन्द्र की इस योजना के प्रति कर्ण को सावधान भी करते हैं, लेकिन वह उन्हें धन्यवाद देकर कहता है कि उस समय यदि कोई उससे उसके प्राण भी माँग ले तो वह मना नहीं करेगा। तब सूर्यदेव कहते है कि यदि वह स्ववचनबद्ध है, तो वह इन्द्र से उनका अमोघास्त्र माँग ले।
तब अपनी योजनानुसार इन्द्रदेव एक भिक्षुक का भेष बनाकर कर्ण से उसका कवच और कुण्डल माँग लेते हैं। चेताए जाने के बाद भी कर्ण मना नहीं करता और हर्षपूर्वक अपना कवच-कुण्डल दान कर देता है। तब कर्ण की इस दानप्रियता पर प्रसन्न होकर वह उसे कुछ माँग लेने के लिए कहते हैं, लेकिन कर्ण यह कहते हुए कि "दान देने के बाद कुछ माँग लेना दान की गरिमा के विरुद्ध है ", मना कर देता है। तब इन्द्र उसे अपना शक्तिशाली अस्त्र वासवी प्रदान करते है जिसका प्रयोग वह केवल एक बार ही कर सकता था। इसके बाद से कर्ण का एक और नाम वैकर्तन, पड़ा, क्योंकि उसने बिना संकुचित हुए अपने शरीर से अपने कवच-कुण्डल काट कर दान दे दिए।

कुन्ती और कर्ण

जब महाभारत का युद्ध निकट था, तब माता कुन्ती, कर्ण से भेंट करने गई और उसे उसकी वास्तविक पहचान का ज्ञान कराया। वह उसे बताती हैं कि वह उनका पुत्र है और ज्येष्ठ पाण्डव है। वह उससे कहती हैं कि वह स्वयं को 'कौन्तेय' (कुन्ती पुत्र) कहे नाकी 'राधेय' (राधा पुत्र) और तब कर्ण उत्तर देता है कि वह चाहता है कि सारा सन्सार उसे राधेय के नाम से जाने नाकी कौन्तेय के नाम से। कुन्ती उसे कहती हैं कि वह पाण्डवों की ओर हो जाए और वह उसे राजा बनाएगें। तब कर्ण कहता है कि बहुत वर्ष पूर्व उस रंगभूमि में यदि उन्होनें उसे कौन्तेय कहा होता तो आज स्थिति बहुत भिन्न होती। पर अब किसी भी परिवर्तन के लिए बहुत देर हो चुकि है और अब ये सम्भव नहीं है। वह आगे कहता है कि दुर्योधन उसका मित्र है और उस पर बहुत विश्वास करता है और वह उसके विश्वास को धोखा नहीं दे सकता। लेकिन वह माता कुन्ती को ये वचन देता है कि वह अर्जुन के अतिरिक्त किसी और पाण्डव का वध नहीं करेगा। कर्ण और अर्जुन दोनों ने ही एक दूसरे का वध करने का प्रण लिया होता है और इसलिए दोनों में से किसी एक की मृत्यु तो निश्चित है। वह कहता है कि उनके कोई भी पाँच पुत्र जीवित रहेंगे - चार अन्य पाण्डव और उसमें या अर्जुन में से कोई एक। कर्ण अपनी माता से निवेदन करता है कि वह उनके सम्बन्ध और उसके जन्म की बात को उसकी मृत्यु तक रहस्य रखे।

कुन्ती, कर्ण से एक और वचन माँगती है कि वह नागास्त्र का उपयोग केवल एक बार करे। कर्ण यह वचन भी कुन्ती को देता है। परिणामस्वरूप बाद में कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण एक बार से अधिक नागास्त्र का प्रयोग नहीं कर पाता।






Friday, 19 October 2018

सुर्यपुत्र कर्ण , एक योध्धा (भाग-१)



कौन थे कर्ण ?

महाभारत के सबसे रोचक किरदारों में से एक है कर्ण का किरदार. कर्ण एक महयोध्धा  थे .कर्ण  पांच पांडवों की माता कुंती की पहली संतान थे जिसे कुंती ने विवाह पूर्व ही जन्म दे दिया था . किन्तु समाज के भय के कारण उसे त्याग दिया था . 


 कैसे हुआ कर्ण का जन्म 

कुंती को ऋषि दुर्वासा ने एक वरदान दिया था की चाहे तो किसी भी देवता का आवाहन कर दैवीय पुत्र प्राप्त क्र सकती है . कुंती के मन में संदेह हुआ की ऋषि ने वरदान दिय है वो सभव है की नहीं. अपनी इसी शंका को दूर करने हेतु कुंती ने सूर्य देवता का आवाहन किया और सूर्य देवता द्वारा कुंती को एक पुत्र की प्राप्ति हुई .वो पुत्र कर्ण था जो कवच और कुंडल के साथ पैदा हुआ था . किन्तु समस्या यह थी की कुंती अभी अविवाहित थी और समाज के बीच वो कुंवारी माता बन के नहीं नही रह सकती थी . समाज के भय से कुंती ने अपने ह्रदय पर पत्थर रख कर कर्ण को स्वयं से दूर करने का निर्णय किया और एक टोकरी में कर्ण को रखकर गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया .

कैसे हुआ कर्ण का पालन 

महाराज धृतराष्ट्र के सारथि अधिरथ और उनकी पत्नी राधा जो की संतान विहीन थे. अधिरथ  ने कर्ण को नदी में बहते देखकर उसे अपने घर ले गये और अपना लिया . अपने पुत्र का नाम अधिरथ ने वासुसेन  रखा . अपनी माता के नाम पर उन्हें राधेय नाम से भी जाना जाता है . 

प्रशिक्षण 

कर्ण का लालन पालन एक सारथि के घर पर ही हुआ किन्तु उनके छत्रिय रक्त का प्रभाव ही था जो उन्हें छत्रिय की तरह युध्ध कौशल सीखने की तीव्र इच्छा थी .कर्ण और उसके पिता अधिरथ आचार्य द्रोण से मिले जो उस समय युद्धकला के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों में से एक थे। द्रोणाचार्य उस समय कुरु राजकुमारों को शिक्षा दिया करते थे। उन्होने कर्ण को शिक्षा देने से मना कर दिया क्योंकि कर्ण एक सारथी पुत्र था और द्रोण केवल क्षत्रियों को ही शिक्षा दिया करते थे।


द्रोणाचार्य की असम्मति के उपरान्त कर्ण ने परशुराम  से सम्पर्क किया जो कि केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे। कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा का आग्रह किया। परशुराम ने कर्ण का आग्रह स्वीकार किया और कर्ण को अपने समान ही युद्धकला और धनुर्विद्या में निष्णात किया। इस प्रकार कर्ण परशुराम का एक अत्यन्त परिश्रमी और निपुण शिष्य बना।

कर्ण को मिले श्राप 

कर्ण को उसके गुरु परशुराम और पृथ्वी माता से श्राप मिला था। इसके अतिरिक्त भी कर्ण को बहुत से श्राप मिले थे।

कर्ण की शिक्षा अपने अन्तिम चरण पर थी। एक दोपहर की बात है, गुरु परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। कुछ देर बाद कहीं से एक बिच्छू आया और उसकी दूसरी जंघा पर काट कर घाव बनाने लगा। गुरु का विश्राम भंग ना हो इसलिए कर्ण बिच्छू को दूर ना हटाकर उसके डंक को सहता रहा। कुछ देर में गुरुजी की निद्रा टूटी और उन्होनें देखा की कर्ण की जांघ से बहुत रक्त बह रहा है। उन्होनें कहा कि केवल किसी क्षत्रिय में ही इतनी सहनशीलता हो सकती है कि वह बिच्छु डंक को सह ले, ना कि किसी ब्राह्मण में और परशुरामजी ने उसे मिथ्या भाषण के कारण श्राप दिया कि जब भी कर्ण को उनकी दी हुई शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उस दिन वह उसके काम नहीं आएगी।
कर्ण, जो कि स्वयं यह नहीं जानता था कि वह किस वंश से है, ने अपने गुरु से क्षमा माँगी और कहा कि उसके स्थान पर यदि कोई और शिष्य भी होता तो वो भी यही करता। यद्यपि कर्ण को क्रोधवश श्राप देने पर उन्हें ग्लानि हुई पर वे अपना श्राप वापस नहीं ले सकते थे। तब उन्होनें कर्ण को अपना विजय नामक धनुष प्रदान किया और उसे ये आशीर्वाद दिया कि उसे वह वस्तु मिलेगी जिसे वह सर्वाधिक चाहता है - अमिट प्रसिद्धि। कुछ लोककथाओं में माना जाता है कि बिच्छू के रूप में स्वयं इन्द्र थे, जो उसकी वास्तविक क्षत्रिय पहचान को उजागर करना चाहते थे।

परशुरामजी के आश्रम से जाने के पश्चात, कर्ण कुछ समय तक भटकता रहा। इस दौरान वह शब्दभेदी विद्या सीख रहा था। अभ्यास के दौरान उसने एक गाय के बछड़े को कोई वनीय पशु समझ लिया और उस पर शब्दभेदी बाण चला दिया और बछडा़ मारा गया। तब उस गाय के स्वामी ब्राह्मण ने कर्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार उसने एक असहाय पशु को मारा है, वैसे ही एक दिन वह भी मारा जाएगा जब वह सबसे अधिक असहाय होगा और जब उसका सारा ध्यान अपने शत्रु से कहीं अलग किसी और काम पर होगा।

आन्ध्र की लोक कथाओं के अनुसार एक बार कर्ण कहीं जा रहा था, तब रास्ते में उसे एक कन्या मिली जो अपने घडे़ से घी के बिखर जाने के कारण रो रही थी। जब कर्ण ने उसके सन्त्रास का कारण जानना चाहा तो उसने बताया कि उसे भय है कि उसकी सौतेली माँ उसकी इस असावधानी पर रुष्ट होंगी। कृपालु कर्ण ने तब उससे कहा कि बह उसे नया घी लाकर देगा। तब कन्या ने आग्रह किया कि उसे वही मिट्टी में मिला हुआ घी ही चाहिए और उसने नया घी लेने से मना कर दिया। तब कन्या पर दया करते हुए कर्ण ने घी युक्त मिट्टी को अपनी मुठ्ठी में लिया और निचोड़ने लगा ताकि मिट्टी से घी निचुड़कर घड़े में गिर जाए। इस प्रक्रिया के दौरान उसने अपने हाथ से एक महिला की पीड़ायुक्त ध्वनि सुनी। जब उसने अपनी मुठ्ठी खोली तो धरती माता को पाया। पीड़ा से क्रोधित धरती माता ने कर्ण की आलोचना की और कहा कि उसने एक बच्ची के घी के लिए उन्हें इतनी पीड़ा दी। और तब धरती माता ने कर्ण को श्राप दिया कि एक दिन उसके जीवन के किसी निर्णायक युद्ध में वह भी उसके रथ के पहिए को वैसे ही पकड़ लेंगी जैसे उसने उन्हें अपनी मुठ्ठी में पकड़ा है, जिससे वह उस युद्ध में अपने शत्रु के सामने असुरक्षित हो जाएगा।
इस प्रकार, कर्ण को तीन पृथक अवसरों पर तीन श्राप मिले। दुर्भाग्य से ये तीनों ही श्राप कुरुक्षेत्र के निर्णायक युद्ध में फलीभूत हुए, जब वह युद्ध में अस्त्र विहीन, रथ विहीन और असहाय हो गया था।

विविध श्रापों के प्रभाव

कर्ण को मिले विविध श्रापों का प्रभाव इस प्रकार हुआ।

दो ब्रह्मास्त्रों का टकराना


यदि एक ब्रह्मास्त्र भी शत्रु के खेमें पर छोड़ा जाए तो ना केवल वह उस खेमे को नष्ट करता है बल्कि उस पूरे क्षेत्र में १२ से भी अधिक वर्षों तक अकाल पड़ता है। और यदि दो ब्रह्मास्त्र आपस में टकरा दिए जाएँ तब तो मानो प्रलय ही हो जाता है। इससे समस्त पृथ्वी का विनाश हो जाएगा और इस प्रकार एक अन्य भूमण्डल और समस्त जीवधारियों की रचना करनी पड़ेगी। महाभारत के युद्ध में दो ब्रह्मास्त्रों के टकराने की स्थिति तब आई जब ऋषि वेदव्यासजी के आश्रम में अश्वत्थामा और अर्जुनने अपने-अपने ब्रह्मास्त्र चला दिए। तब वेदव्यासजी ने उस टकराव को टाला और अपने-अपने ब्रह्मास्त्रों को लौटा लेने को कहा। अर्जुन को तो ब्रह्मास्त्र लौटाना आता था, लेकिन अश्वत्थामा ये नहीं जानता था और तब उस ब्रह्मास्त्र के कारण परीक्षित, उत्तरा के गर्भ से मृत पैदा हुआ।
लेकिन कर्ण गुरु परशुराम के श्राप के कारण ब्रह्मास्त्र चलाना भूल गया था, नहीं तो वह युद्ध में अर्जुन का वध करने के लिए अवश्य ही अपना ब्रह्मास्त्र चलाता और अर्जुन भी अपने बचाव के लिए अपना ब्रह्मास्त्र चलाता और पूरी पृथ्वी का विनाश हो जाता। इस प्रकार गुरु परशुराम ने कर्ण को श्राप देकर पृथ्वी का विनाश टाल दिया।

धरती माता के श्राप का प्रभाव


धरती माता का श्राप यह था कि कर्ण के जीवन के सबसे निर्णायक युद्ध में धरती उसके रथ के पहिये को पकड़ लेंगी। उस दिन के युद्ध में कर्ण ने अलग-अलग रथों का उपयोग किया, लेकिन हर बार उसके रथ का पहिया धरती में धस जाता। इसलिए विभिन्न रथों का प्रयोग करके भी कर्ण धरती माता के श्राप से नहीं बच सकता था, अन्यथा वह उस निर्णायक युद्ध में अर्जुन पर भारी पड़ता।

दुर्योधन से मित्रता और अंगराज

कर्ण का राज्याभिषेक
गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों की शिक्षा पूरी होने पर हस्तिनापुर में एक रंगभूमि का आयोजन करवाया। रंगभूमि में अर्जुन विशेष धनुर्विद्या युक्त शिष्य प्रमाणित हुआ। तभी कर्ण रंगभूमी में आया और अर्जुन द्वारा किए गए करतबों को पार करके उसे द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारा। कब कृपाचार्य ने कर्ण के द्वन्द्वयुद्ध को अस्वीकृत कर दिया और उससे उसके वंश और साम्राज्य के विषय में पूछा - क्योंकि द्वन्द्वयुद्ध के नियमों के अनुसार केवल एक राजकुमार ही अर्जुन को, जो हस्तिनापुर का राजकुमार था, द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकार सकता था। तब कौरवों में सबसे ज्येष्ठ दुर्योधन ने कर्ण को अंगदेश का राजा घोषित किया जिससे वह अर्जुन से द्वन्द्वयुद्ध के योग्य हो जाए। जब कर्ण ने दुर्योधन से पूछा कि वह उससे इसके बदले में क्या चाहता है, तब दुर्योधन ने कहा कि वह केवल ये चाहता है कि कर्ण उसका मित्र बन जाए।
इस घटना के बाद महाभारत के कुछ मुख्य सम्बन्ध स्थापित हुए, जैसे दुर्योधन और कर्ण के बीच सुदृढ़ सम्बन्ध बनें, कर्ण और अर्जुन के बीच तीव्र प्रतिद्वन्द्विता और पाण्डवों तथा कर्ण के बीच वैमनस्य।
कर्ण, दुर्योधन का एक निष्ठावान और सच्चा मित्र था।
यद्यपि वह बाद में दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए द्यूतक्रीड़ा में भागीदारी करता है, लेकिन वह आरम्भ से ही इसके विरुद्ध था। कर्ण शकुनि को पसन्द नहीं करता था और सदैव दुर्योधन को यही परमर्श देता कि वह अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिए अपने युद्ध कौशल और बाहुबल का प्रयोग करे ना कि कुटिल चालों का। जब लाक्षागृह में पाण्डवों को मारने का प्रयास विफल हो जाता है, तब कर्ण दुर्योधन को उसकी कायरता के लिए डाँटता है और कहता है कि कायरों की सभी चालें विफल ही होती हैं और उसे समझाता है कि उसे एक योद्धा के समान कार्य करना चाहिए और उसे जो कुछ भी प्राप्त करना है, उसे अपनी वीरता द्वारा प्राप्त करे। चित्रांगद की राजकुमारी से विवाह करने में भी कर्ण ने दुर्योधन की सहायता की थी। अपने स्वयंवर में उसने दुर्योधन को अस्वीकार कर दिया और तब दुर्योधन उसे बलपूर्वक उठा कर ले गया। तब वहाँ उपस्थित अन्य राजाओं ने उसका पीछा किया, लेकिन कर्ण ने अकेले ही उन सबको परास्त कर दिया। परास्त राजाओं में जरासन्ध, शिशुपाल, दन्तवक्र, साल्व और रुक्मी इत्यादि थे। कर्ण की प्रशंसा स्वरूप, जरासन्ध ने कर्ण को मगध का एक भाग दे दिया। भीम ने बाद में श्रीकृष्ण की सहायता से जरासन्ध को परास्त किया लेकिन उससे बहुत पहले कर्ण ने उसे अकेले परास्त किया था। कर्ण ही ने जरासन्ध की इस दुर्बलता को उजागर किया था कि उसकी मृत्यु केवल उसके धड़ को पैरों से चीर कर दो टुकड़ो में बाँट कर हो सकती है।
  


Tuesday, 16 October 2018

राम लीला, इतिहास एवं महत्त्व

राम लीला, इतिहास एवं महत्त्व 

  आश्विन मॉस की नवरात्री के आगमन के साथ ही भारत के विभिन्न राज्यों में राम लीला कथा का मंचन होना प्रारंभ हो जाता है और  दशहरा के साथ यह मंचन समाप्त भी हो जाता है. रामलीला मंचन प्रारंभ करने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास जी को दिया जाता  है क्युकी उनके द्वारा रचीं गयी  रामचरितमानस ने ही श्री राम को घर घर तक पहुचाया .


कौन थे श्री राम और क्यों होता है राम लीला का मंचन ?

जैसा की सर्व विदित  है कि त्रेता युग में भगवान् श्री विष्णु ने अपना सातवां अवतार रघुवंश के महाराज दशरथ के पुत्र राम के रूप में लिया . राम अवतार के रूप में भगवान् ने सभी मनुष्यों के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत किया . एक आदर्श पुत्र , आदर्श पुरुष और आदर्श राजा के रूप में भगवान् श्रीराम आदिकाल से ही स्मरण किये जाते है .

     गोस्वामी तुलसीदास ने संस्कृत में रचित रामायण की जटिलता को देखते हुए रामचरितमानस की रचना की ताकि समाज में फैलती कुरीतियों को रोकने के लिए भगवान् राम को एक आदर्श के रूप में घर घर तक पहुचाया जा सके .


राम लीला के आकर्षण 

   वैसे तो राम लीला अत्यधिक विशाल है फिर भी इस कथा के कुछ आकर्षण हैं जिनका मंचन  हर वर्ष कलाकार रामलीला में करते हैं और उनमें  से कुछ मुख्य हैं -

१. सीता स्वयंवर  और श्रीराम द्वारा शिव धनुष का भंजन 

माँ सीता का जन्म राजा जनक के घर हुआ था और राजा जनक अपनी पुत्री के लिए एक योग्य वर की तलाश में थे, अतः उन्होंने सीता स्वयंवर का आयोजन किया और ये चुनौती रखी की जो  कोई राजा शिव धनुष की प्रत्यंचा चढाएगा उसी से सीताजी का विवाह होगा . स्वंयवर में बड़े बड़े राज्यों के राजा  आये थे लेकिन कोई भी शिव धनुष पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाया , उस समय राम और लक्ष्मण  जो कि गुरु वशिष्ट से शस्त्र विद्या ग्रहण कर रहे थे गुरु वशिष्ट के साथ स्वयंवर में उपस्थित थे जब कोई भी राजा धनुष पर प्रत्यंचा न चढा पाया तो निराश होकर राजा  जनक ने कहा कि क्या इस धरती पर कोई भी छत्रिय नही बचा जो इस धनुष की प्रत्यंचा चढा   सके  , आक्रोश में आकर लक्ष्मण ने राजा जनक से  बोला कि मेरे भ्राता के होते हुए आपने ये कैसे सोच लिया कि इस धनुष की प्रत्यंचा  कोई छत्रिय नहीं चढा  सकता . क्यूंकि राम और लक्ष्मण ने साधू के समान वस्त्र  धारण किये थे तो राजा जनक कुछ समझ नहीं पाए तब गुरु वशिष्ट ने राजा को राम और लक्ष्मण का परिचय दिया .




गुरु की आज्ञा लेकर राम ने शिव धनुष उठाया और धनुष की प्रत्यंचा चढाने लगे , और धनुष  टूट गया .धनुष के टूटते ही ऋषि परशुराम का ध्यान भंग हो गया और तु्रन्त ही वो राजमहल पहुच गये . क्रोधित  परशुराम बोले मेरे अराध्य देव शिव के धनुष का भंजन करने वाले को मैं  मृत्यु के पास भेज दूंगा , जिस पर लक्ष्मण क्रोधित हो उठे और परशुराम से बहस करने लगे , तब श्री राम ने बड़ी ही शांति से ऋषि परशुराम को प्रणाम किया और सारी घटना बताई , परशुराम ने भगवान् राम के दिव्य रूप को  पहचान लिया और वहां से चले गये .तत्पश्चात राम और सीताजी का विवाह संपन्न हुआ .




२. ताड़का वध 

   ताड़का नाम की राक्षशी ने सभी ऋषियों को परेशान किया  हुआ था और वो उनके यज्ञ और अनुष्ठान को भंग कर देती थी और ऋषियों का भी वध कर देती थी . तब राम  और लक्ष्मण ऋषियों की रक्षा के लिए वन में गये और ताड़का का वध किया.



३. सूर्पनखा की नाक काटना 

राजा दशरथ की रानी कैकेयी ने  राजा दशरथ से तीन वचन लिए जिनमें से एक वचन था राम को 14 वर्षों का वनवास , न चाहते हुए भी राजा दशरथ को यह वचन देना पड़ा, जब लक्ष्मण को ज्ञात हुआ तो उन्होंने भी राम के साथ वन जाने की जिद की . तब राम ,माँ सीता  और लक्ष्मण को लेकर वन को प्रस्थान करते हैं . एक दिन वन में लक्ष्मण  कुटिया के बाहर पहरेदारी कर रहे थे तभी वहां सूर्पनखा आ पहुची उसने जब लक्ष्मण को देखा वो उन पर मोहित हो गयी और उसने एक सुंदरी का रूप धारण किया . सुंदरी रूप में वह लक्ष्मण के पास पहुची और उनके सम्मुख प्रेम प्रस्ताव रखा . लक्ष्मणजी  जो की पहले से ही माँ सीता की बहन उर्मिला जी से विवाहित थे उन्होंने यह प्रस्ताव शालीनता के साथ ठुकरा  दिया. सूर्पनखा ने काफी प्रयास किया लक्ष्मण को समझाने का किन्तु जब वो नहीं माने तो सूर्पनखा अपने असली रूप में आ गयी और लक्ष्मण और सीताजी को नुकशान पहुचाने का प्रयास करने लगी . लक्ष्मण ने सूर्पनखा से निवेदन किया की हम रघुवंशी स्त्रियों पर प्रहार नहीं करते अतः वो वहाँ से चली जाए किन्तु जब सूर्पनखा नहीं मानी तो लक्ष्मण जी ने उसकी नाक काट दी . सूर्पनखा अपनी कटी हुई नाक लेकर वहां से भागकर सीधे अपने भाई लंका के नरेश रावण के पास जाकर लक्ष्मण के बारे में बताती है.


३.  सीता हरण

अपनी बहन सूर्पनखा की नाक कटने से क्रोधित रावण,इसका प्रतिशोध लेने की शपथ लेता है और अपने गुप्तचर राक्षसों से लक्ष्मण और उसके साथियों की खबर लाने को कहता है . रावण के गुप्तचर उसे बताते है की राम ,लक्ष्मण  और सीता वन में वनवास पर है और राम एवं लक्ष्मण दोनों बहुत पराक्रमी  हैं .तब रावण माँ सीता के अपहरण की योजना बनाता है . रावण को ज्ञात था की राम और लक्ष्मण ने ताड़का का भी वध किया था .वो ताड़का के भाई मारीच को बुलाता है , मारीच रूप बदलने की कला में पारंगत था ,वो जो चाहे वो रूप धारण कर सकता था .मारीच जानता था की राम कोई दैवीय पुरुष हैं इसिलए वो रावण की सहायता को मना कर देता है , तब रावण कहता है यदि तुमने मेरा साथ नहीं दिया तो में तुम्हारा वध कर दूंगा . रावण कहता है तुम्हें राम और लक्ष्मण  को सीता से दूर वन में ले जाना पड़ेगा . मारीच सोचता है कि वो रावण का साथ देगा तो राम के हाथों मारा जाएगा इस तरह मुक्ति को प्राप्त होगा और सोचता है रावण के हाथों मरने से अच्छा है की राम के हाथों अपने प्राण गवाए . मारीच वन में सुनहरे रंग के हिरन का रूप धारण करता है जिसे माँ सीता देखती है और राम से अनुरोध करती है की वो उस हिरन को पकड़कर लाये , हिरन वन में भाग जाता है , राम सीता की जिद पूरी करने के लिए वन में हिरन की खोज करने जाते है और कुटिया में लक्ष्मण को छोड़ छोड़कर जाते  हैं , काफी देर तक राम लौटकर नहीं आते  तभी रावण राम की आवाज में चीख निकालते हैं जिसे सुनकर माँ सीता चिंतित हो जाती हैं और लक्ष्मण को कहती हैं कि जाकर देखें की कहीं राम किसी मुसीबत में तो नहीं, लक्ष्मण सीता माँ को अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे  इसलिए कुटिया के चारों ओर एक रेखा खीचते हैं और सीता से कहते हैं कि ये रेखा आपकी रक्षा करेगी ,इसके बाहर  किसी भी स्थिति में न जाए ,और फिर राम को खोजने वन में चले जाते हैं .अवसर पाकर रावण साधू का भेष धारण करता है और भिक्षा मांगने सीता के पास जाता है सीता उन्हें लक्ष्मण रेखा  के भीतर से ही दक्षिणा देती है जिसे साधू रूप में रावण लेने से मना कर  देता है, और उन्हें रेखा के बाहर आकर दक्षिणा देने को कहता है माँ सीता साधू को खाली हाथ नहीं भेजना चाहती इसलिए वो लक्ष्मण रेखा पार करती हैं जैसी वो रेखा पार करती हैं, रावण माँ सीता को उठाकर अपने पुष्पक विमान मे बैठाकर लंका ले जाता है . 



4. रावण और अंगद संवाद 

    राम जब हिरन को मारते है तो मारीच अपने असली रूप में आ जाता है और सारी सच्चाई राम को बता देता है , राम ओर लक्ष्मण कुटिया पर लौटते है और सीता को न पाकर सीता की खोज करते है और मार्ग में उन्हें जटायु मिलते  हैं  जो रावण को रोकने के प्रयास में घायल हो चुके थे वो राम को आगे के मार्ग पर भेजते हैं और उन्हें इसी मार्ग पर पहले हनुमान , फिर सुग्रीव और वानर सेना का सहयोग मिलता है . हनुमान लंका में जाकर माँ सीता की खबर लेकर आते हैं और लंका पर आक्रमण करने का निवेदन करते है . राम पहले रावण को दूत भेजकर समझाने का प्रयास करना चाहते है और अंगद को दूत  बनाकर भेजते हैं . अंगद जाकर रावण को समझाने का प्रयास करता है किन्तु सभी राक्षस अंगद का उपहास करते हैं और उसे लौट जाने को कहते हैं अंगद वहाँ उपस्थित  सभी लोगों को चुनौती  देते हैं की यदि कोई भी उसका पैर धरती से हिला देगा तो वो तुरंत ही वहां से चला जाएगा . 

एक एक कर सभी राक्षस ,प्रयास करते हैं पर कोई भी अंगद का पैर नहीं उठा पाता ,तब रावण स्वयं अपने सिहांसन से उठकर अंगद का पैर उठाने को जैसे  ही झुकता है अंगद अपना पैर हटा लेता है और बोलता है कि मेरे चरण पड़ने से अच्छा है श्री राम के चरण पड़े तो शायद वो उसे छमा कर दें  , रावण अंगद को कैद करने का प्रयास करता है तब अंगद बोलता है की मैं तो केवल एक दूत हूँ  जो श्री राम का सन्देश लेकर आया हूँ और मुझे  आपका जवाब लेकर वापस जाना है . रावण राम को युद्ध करने का सन्देश भेजता है और अंगद लंका से लौट जाता है .

5. रावण वध 

  अंत में राम और रावण के बीच भीषण  युध्ध होता है , राम कई बार रावण का सर धड से अलग कर देते हैं पर हर बार रावण का सर वापस धड से जुड़ जाता है . राम सोच में पड़ जाते हैं  कि आखिर रावण को मारा कैसे जाए ,तब रावण का भाई विभिषण श्री राम को बताता है कि रावण को वरदान प्राप्त है और उसके प्राण उसकी नाभि में स्थित हैं ,वहां प्रहार करने पर ही रावण को मारा जा सकता है , अगले ही छण राम अपना तीर सीधे रावण की नाभि पर मारते है और रावण का वध कर माँ सीता को मुक्त कराते हैं .


जिस दिन राम ने रावण का वध किया वो दिन दशहरे  के रूप में मनाया जाता है और हर वर्ष इस दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है  .


    "अतः रामलीला, श्री राम को आदर्श शिष्य , आदर्श पुत्र , आदर्श पति के रूप में दर्शाती है  , साथ ही यह सन्देश देती है हर बुराई का अंत एक न एक दिन निश्चित ही  होता है " 



  

   

Monday, 15 October 2018

दुर्गाष्टमी का महत्व

नवरात्री में अष्टमी का क्या महत्व है ?


नवरात्री प्रारंभ होने के बाद आठवे दिन को अष्टमी ,  दुर्गाष्टमी या महा अष्टमी कहा जाता है ।दुर्गा पूजा के दस दिनों में सबसे पवित्र  दिन अष्टमी को माना जाता है  ।जो लोग पूरे नौ दिन व्रत नहीं रख पाते वो लोग अष्टमी के दिन उपवास रखते हैं ।इस दिन माँ दुर्गा के हथियारों की पूजा की जाती है , और इसे "वीर अष्टमी" भी कहा जाता है ।


दुर्गाष्टमी का इतिहास और महत्त्व 


 माँ दुर्गा से जुडी कई सारी कहानियाँ प्रचलित है जिसमे से सबसे अधिक प्रशिद्ध और प्रचलित कहानी है राक्षस महिषासुर की ।महिषासुर ने भगवान ब्रह्मा की अराधना में  घोर तपस्या की और भगवान् ब्रह्मा को प्रशन्न  किया। महिषासुर ने वरदान ये अस्शिर्वाद माँगा की कोई कोई भी पुरुष उसका वध न कर पाए और भगवान् ने उसे ये वरदान दे दिया ।
    ब्रह्म्देवता के वरदान मिलने के बाद महिषासुर ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया , सभी देवता महिषासुर के सामने बेबस हो गये और ब्रह्मा , विष्णु और शिव तीनो देवताओं के पास अपनी दुविधा लेकर पहुचे  । तब तीनों ने मिलकर एक समाधान निकाला ।तीनो ने अपनी शक्ति को एकत्रित किया जिससे आदिशक्ति का जन्म हुआ । आदिशक्ति माँ दुर्गा ने शुक्ल  पक्ष की अष्टमी को महिसासुर का संहार किया इसीलिए माँ दुर्गा को महिषासुर मर्दिनिं भी कहा जाता है ।अतः दुर्गा अष्टमी का उपवास कर माँ दुर्गा को प्रसन्न किया जाती जो सभी दुखों क नाश करती है  ।


पूजा विधि 

 अष्टमी के दिन प्रातःकाल में स्नान करने के पश्चात पूजन के लाल फूल ,चन्दन ,दिया ,धूप इत्यादि का प्रयोग किया जाता  है और नेवैद्य चडाया जाता है  । गाय के दूध ,दही , घी, शहद और चीनी के मिश्रण से पंचामृत तैयार किया जाता है  । यह पंचामृत पवित्र माना जाता है और घर के सभी सदस्यों को पिलाया जात है  । दुर्गा चालिषा के  पाठ द्वारा माँ दुर्गा की पूजा की जाती है  । कुछ लोग नवरात्री का  उपवास अष्टमी के दिन ही खखोल देते हैं इसलिए इसी दिन नौ कन्याओं को भोजन कराकर अपना उपवास पूरा करते  हैं  । 

दुर्गा पूजा 

भारत के पूर्वी हिस्सों में अष्टमी के दिन दुर्गा पूजा बड़े ही धूम धाम से मनाये जाती है , विशेषकर बंगाल में दुर्गा पूजा का अलग ही महत्व है  ।  कई दिन पहले ही दुर्गा माँ की भव्य प्रतिमा का निर्माण किया जाता है  ।जगह जगह पंडाल लगाये जाते हैं जहां दुर्गा माँ की प्रतिमा की स्थापना की जाती है  । दुर्गा पूजा में मुख्य रूप से नारियां ही शामिल होती है ,सभी औरते एक दुसरे को गुलाल लगाती हैं 



Sunday, 14 October 2018

नवरात्री में क्या खाएं और कैसे खोलें अपना उपवास

उपवास करने वाले क्या खाएं और कैसे खोले अपना उपवास 

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      नवरात्री के दिनों में माँ दुर्गा की अराधना के साथ बहुत से लोग पूरे नौ दिनों तक उपवास रखते हैं , केवल एक वक़्त रात्रि का भोजन ही करते हैं।उपवास रखने का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं है बल्कि अपनी बुरी आदतों का भी त्याग करना है इसलिए उपवास के दौरान-

  •  दिन में केवल जलपान किया जाता है
  • जो लोग पूरे  दिन खाली पेट नहीं रह पाते वो लोग  , फल , दूध और दही का सेवन कर सकते हैं   
  • अधिकाँश लोग दिन में चाय का सेवन करते हैं , चाय भूख को कम करती है इसलिए उपवास करना आसान हो जाता है 
  • रात्रि भोजन का विशेष ध्यान  रखना चाहिए
  • लहसुन और प्याज का सेवन नवरात्री के दिनों में वर्जित है अतः इसे घर के  भोजन में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए , लहसुन ओर प्याज को तामसी प्रवर्ती का माना गया है 
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  • नवरात्री  दौरान मदिरापान और किसी भी प्रकार के अन्य नशे का उपयोग नहीं करना चाहिए
  • उपवास करने वाले व्यक्ति को अनाज का सेवन नहीं करना चाहिए ,  गेहूं के आटे के स्थान पर कुट्टू ,या सिंगाड़े के आटे का इस्तेमाल रोटी या पूरी बनाने  के लिए करना चाहिए 

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  • नवरात्री में साबूदाने की खिचड़ी, और खीर खायी जाती है ।खीर बनाने के लिए मखाने का भी इस्तेमाल किया जा सकता है 
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  • विष्णु पुराण के अनुसार नवरात्रि  व्रत के समय दिन में नहीं सोना चाहिए 
  • ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए ओर देवी का पूजन करना चाहिए 
  • नौ दिन में २४ हजार गायत्री मन्त्रों का जाप करना चाहिए , जाप करने के लिए तुलसी ,चन्दन या रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना चाहिए 

क्या होता है कन्या पूजन और इसका महत्त्व 

  • नौ  दिनों तक उपवास करने के बाद  उपवास खोलने से पूर्व कन्या पूजन किया जाता है ।
  •  वैसे तो हर दिन एक कन्या को भोजन करना चाहिए । किन्तु अष्टमी और नवमी को  नौ बालिकाओं को भोजन कराया जात है ।
  •  नौ बालिकाओं को जिनकी आयु १0 वर्ष  से कम हो ,और एक बालक को  को घर पर बुलाकर उन्हें एक स्थान पर कृम से बैठाया जाता है । 
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  • बालक को हनुमान जी का रूप माना जाता है ।जैसे  माँ की पूजा भैरव की पूजा के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती, वैसे ही कन्या पूजन बालक के बिना अधूरी मानी जाती है 
  • सभी बच्चों को शुध्ध आसन लगाकर बैठाया जाता है और उनके पैर धोये जाते है जिसे अपने शीश पर लगते है 
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  • तत्पश्चात माथे पर चन्दन और कुमकुम लगाते हैं  , और पुष्प चढाते हैं और उन सभी की आरती की जाती है 
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  • आरती के पश्चात सभी को घर में बनाये गये प्रसाद और  व्यंजनों  का भोग लगाया जाता है 
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  • भोजन उपरांत सभी को दक्षिणा भी दी जाती है 
  •  कन्या पूजन पूर्ण  होने के बाद ही अपना उपवास छोड़ना चाहिए 


Saturday, 13 October 2018

नवरात्री लोकनृत्य , गरबा

नवरात्री में गरबे का महत्व ,

जैसा की अधिकांश लोग ये जानते हैं कि गरबा गुजरात का एक प्रशिध्ध लोकनृत्य है, यह नाम संस्कृत के गर्भ-द्वीप से आया है ।नवरात्रि के पहले दिन छिद्रयुक्त  एक मिट्टी के घड़े को स्थापित किया जाता है जिसके अंदर दीपक प्रज्वलित किया जाता है और साथ ही चांदी का एक सिक्का रखा जाता है। इस दीपक को दीपगर्भ कहा जाता है। गुजरात में इसे गरबी कहा जाता है ।ये गरबी देवी माँ की सृजन शक्ति को प्रदर्शित करती है ।गरबी की परिक्रमा करके ये नृत्य किया जात है इसीलिए इसे गरबा कहा जाता है ।

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    नवरात्री की नौ रात्रि माँ शक्ति को प्रसन्न करने के लिए गरबी के चारों ओर घूमकर नृत्य किया जाता है , जिसे स्त्री और पुरुष साथ में मिलकर करते हैं

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   नवरात्री में गरबा करने के लिए औरते और पुरुष रंग बिरंगे वस्त्र पहनते हैं,लडकियाँ चनिया-चोली पहनती हैं और साथ मे विविध प्रकार के आभूषण पहनती हैं, तथा लडके गुजराती केडिया पहन कर सिर पर पगडी बांधते हैं,और रात्रि के समय एक स्थान पर एकत्रित होकर गरबा खेलते हैं

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   जैसे ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए भजन कीर्तन किया जाता है , वैसे ही गरबे में नृत्य के माध्यम से माँ अम्बा की उपासना की जाती है और उन्हें प्रसन्न किया जाता है ,गरबे  में नृत्य करते समय तीन बार ताली बजाकर एक क्रम पूरा होता है ,और बार बार यही क्रम दोहराया जाता है

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 तीन तालियों का कारण:

पहली ताली

पहली ताली ब्रह्मा की सृजन शक्ति को समर्पित है, क्यूंकि उन्होंने ही संसार  का सृजन किया है  ।

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दूसरी ताली

दूसरी ताली भगवान् विष्णु को समर्पित है जो संसार के पालनहार है।
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तीसरी ताली

जबकि तीसरी ताली शिव रूप की उपासना के लिए जो बुराई का संहार करते नवरात्री का महत्व, कैसे करें माँ की उपासना है। 
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   ऐसा माना जाता है की आदिशक्ति जगदम्बा का जन्म ब्रह्मा, विष्णु और  शिव तीनों की शक्तियों के मिलन से हुआ था , अतः तीन तालियों को मिलकर ही गरबा नृत्य संपूर्ण माना जाता है ।

गरबा नृत्य के विभिन्न स्वरुप 

   मुख्य रूप से गरबा नृत्य घूमकर और तालियाँ बजाकर किया जाता है , लेकिन रात्रि १२ बजे के बाद रास गरबा किया जाता है जो की स्त्री और पुरुष की जोड़ी में  किया जाता है , जिसे डांडिया  भी कहते है 

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समय के साथ  साथ  गरबा में के स्वरुप में भी काफी बदलाव आ गया है , विभिन्न प्रकार के परिधानों के साथ गरबे में भी बॉलीवुड और मॉडर्न डांस फॉर्म का फ्यूज़न किया जाने लगा है । बड़े शहरों में नवरात्री प्रारम्भ होने से एक माह पूर्व ही गरबा सिखाने की क्लासेज लगने लगती है जहाँ लोग गरबा करना सीखते हैं ।

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अनेक संस्थाओं द्वारा नवरात्री में गरबे की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है और विजयी प्रतिभागी को पुरस्कृत किया जाता  है 

    वैसे तो अब गरबा गुजरात से बाहर महाराष्ट्, मध्य प्रदेश , राजस्थान ,उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में भी खेला जाने लगा है किन्तु ये गुजराती संस्कृति का अभिन्न अंग है किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कि विवाह, गृह पूजन , मंदिर प्रतिष्ठा इत्यादि से पहले गरबा किया जात है 

गुजरात में नवरात्री का महत्व बाकी सभी त्योहारों से अधिक है ।नवरात्री के लिए बड़े बड़े पंडाल सजाये जाते हैं और आजकल गरबा ,गाने के लिए विभिन्न कलाकारों को भी बुलाया जाता है , गरबे में लोग माँ के भजनों के अलावा देशभक्ति के गानों पर  भी खूब झूमकर नृत्य करते हैं।