राम लीला, इतिहास एवं महत्त्व
आश्विन मॉस की नवरात्री के आगमन के साथ ही भारत के विभिन्न राज्यों में राम लीला कथा का मंचन होना प्रारंभ हो जाता है और दशहरा के साथ यह मंचन समाप्त भी हो जाता है. रामलीला मंचन प्रारंभ करने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास जी को दिया जाता है क्युकी उनके द्वारा रचीं गयी रामचरितमानस ने ही श्री राम को घर घर तक पहुचाया .
कौन थे श्री राम और क्यों होता है राम लीला का मंचन ?
जैसा की सर्व विदित है कि त्रेता युग में भगवान् श्री विष्णु ने अपना सातवां अवतार रघुवंश के महाराज दशरथ के पुत्र राम के रूप में लिया . राम अवतार के रूप में भगवान् ने सभी मनुष्यों के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत किया . एक आदर्श पुत्र , आदर्श पुरुष और आदर्श राजा के रूप में भगवान् श्रीराम आदिकाल से ही स्मरण किये जाते है .
गोस्वामी तुलसीदास ने संस्कृत में रचित रामायण की जटिलता को देखते हुए रामचरितमानस की रचना की ताकि समाज में फैलती कुरीतियों को रोकने के लिए भगवान् राम को एक आदर्श के रूप में घर घर तक पहुचाया जा सके .
राम लीला के आकर्षण
वैसे तो राम लीला अत्यधिक विशाल है फिर भी इस कथा के कुछ आकर्षण हैं जिनका मंचन हर वर्ष कलाकार रामलीला में करते हैं और उनमें से कुछ मुख्य हैं -
१. सीता स्वयंवर और श्रीराम द्वारा शिव धनुष का भंजन
माँ सीता का जन्म राजा जनक के घर हुआ था और राजा जनक अपनी पुत्री के लिए एक योग्य वर की तलाश में थे, अतः उन्होंने सीता स्वयंवर का आयोजन किया और ये चुनौती रखी की जो कोई राजा शिव धनुष की प्रत्यंचा चढाएगा उसी से सीताजी का विवाह होगा . स्वंयवर में बड़े बड़े राज्यों के राजा आये थे लेकिन कोई भी शिव धनुष पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाया , उस समय राम और लक्ष्मण जो कि गुरु वशिष्ट से शस्त्र विद्या ग्रहण कर रहे थे गुरु वशिष्ट के साथ स्वयंवर में उपस्थित थे जब कोई भी राजा धनुष पर प्रत्यंचा न चढा पाया तो निराश होकर राजा जनक ने कहा कि क्या इस धरती पर कोई भी छत्रिय नही बचा जो इस धनुष की प्रत्यंचा चढा सके , आक्रोश में आकर लक्ष्मण ने राजा जनक से बोला कि मेरे भ्राता के होते हुए आपने ये कैसे सोच लिया कि इस धनुष की प्रत्यंचा कोई छत्रिय नहीं चढा सकता . क्यूंकि राम और लक्ष्मण ने साधू के समान वस्त्र धारण किये थे तो राजा जनक कुछ समझ नहीं पाए तब गुरु वशिष्ट ने राजा को राम और लक्ष्मण का परिचय दिया .
गुरु की आज्ञा लेकर राम ने शिव धनुष उठाया और धनुष की प्रत्यंचा चढाने लगे , और धनुष टूट गया .धनुष के टूटते ही ऋषि परशुराम का ध्यान भंग हो गया और तु्रन्त ही वो राजमहल पहुच गये . क्रोधित परशुराम बोले मेरे अराध्य देव शिव के धनुष का भंजन करने वाले को मैं मृत्यु के पास भेज दूंगा , जिस पर लक्ष्मण क्रोधित हो उठे और परशुराम से बहस करने लगे , तब श्री राम ने बड़ी ही शांति से ऋषि परशुराम को प्रणाम किया और सारी घटना बताई , परशुराम ने भगवान् राम के दिव्य रूप को पहचान लिया और वहां से चले गये .तत्पश्चात राम और सीताजी का विवाह संपन्न हुआ .
गुरु की आज्ञा लेकर राम ने शिव धनुष उठाया और धनुष की प्रत्यंचा चढाने लगे , और धनुष टूट गया .धनुष के टूटते ही ऋषि परशुराम का ध्यान भंग हो गया और तु्रन्त ही वो राजमहल पहुच गये . क्रोधित परशुराम बोले मेरे अराध्य देव शिव के धनुष का भंजन करने वाले को मैं मृत्यु के पास भेज दूंगा , जिस पर लक्ष्मण क्रोधित हो उठे और परशुराम से बहस करने लगे , तब श्री राम ने बड़ी ही शांति से ऋषि परशुराम को प्रणाम किया और सारी घटना बताई , परशुराम ने भगवान् राम के दिव्य रूप को पहचान लिया और वहां से चले गये .तत्पश्चात राम और सीताजी का विवाह संपन्न हुआ .
२. ताड़का वध
ताड़का नाम की राक्षशी ने सभी ऋषियों को परेशान किया हुआ था और वो उनके यज्ञ और अनुष्ठान को भंग कर देती थी और ऋषियों का भी वध कर देती थी . तब राम और लक्ष्मण ऋषियों की रक्षा के लिए वन में गये और ताड़का का वध किया.
३. सूर्पनखा की नाक काटना
राजा दशरथ की रानी कैकेयी ने राजा दशरथ से तीन वचन लिए जिनमें से एक वचन था राम को 14 वर्षों का वनवास , न चाहते हुए भी राजा दशरथ को यह वचन देना पड़ा, जब लक्ष्मण को ज्ञात हुआ तो उन्होंने भी राम के साथ वन जाने की जिद की . तब राम ,माँ सीता और लक्ष्मण को लेकर वन को प्रस्थान करते हैं . एक दिन वन में लक्ष्मण कुटिया के बाहर पहरेदारी कर रहे थे तभी वहां सूर्पनखा आ पहुची उसने जब लक्ष्मण को देखा वो उन पर मोहित हो गयी और उसने एक सुंदरी का रूप धारण किया . सुंदरी रूप में वह लक्ष्मण के पास पहुची और उनके सम्मुख प्रेम प्रस्ताव रखा . लक्ष्मणजी जो की पहले से ही माँ सीता की बहन उर्मिला जी से विवाहित थे उन्होंने यह प्रस्ताव शालीनता के साथ ठुकरा दिया. सूर्पनखा ने काफी प्रयास किया लक्ष्मण को समझाने का किन्तु जब वो नहीं माने तो सूर्पनखा अपने असली रूप में आ गयी और लक्ष्मण और सीताजी को नुकशान पहुचाने का प्रयास करने लगी . लक्ष्मण ने सूर्पनखा से निवेदन किया की हम रघुवंशी स्त्रियों पर प्रहार नहीं करते अतः वो वहाँ से चली जाए किन्तु जब सूर्पनखा नहीं मानी तो लक्ष्मण जी ने उसकी नाक काट दी . सूर्पनखा अपनी कटी हुई नाक लेकर वहां से भागकर सीधे अपने भाई लंका के नरेश रावण के पास जाकर लक्ष्मण के बारे में बताती है.
३. सीता हरण
अपनी बहन सूर्पनखा की नाक कटने से क्रोधित रावण,इसका प्रतिशोध लेने की शपथ लेता है और अपने गुप्तचर राक्षसों से लक्ष्मण और उसके साथियों की खबर लाने को कहता है . रावण के गुप्तचर उसे बताते है की राम ,लक्ष्मण और सीता वन में वनवास पर है और राम एवं लक्ष्मण दोनों बहुत पराक्रमी हैं .तब रावण माँ सीता के अपहरण की योजना बनाता है . रावण को ज्ञात था की राम और लक्ष्मण ने ताड़का का भी वध किया था .वो ताड़का के भाई मारीच को बुलाता है , मारीच रूप बदलने की कला में पारंगत था ,वो जो चाहे वो रूप धारण कर सकता था .मारीच जानता था की राम कोई दैवीय पुरुष हैं इसिलए वो रावण की सहायता को मना कर देता है , तब रावण कहता है यदि तुमने मेरा साथ नहीं दिया तो में तुम्हारा वध कर दूंगा . रावण कहता है तुम्हें राम और लक्ष्मण को सीता से दूर वन में ले जाना पड़ेगा . मारीच सोचता है कि वो रावण का साथ देगा तो राम के हाथों मारा जाएगा इस तरह मुक्ति को प्राप्त होगा और सोचता है रावण के हाथों मरने से अच्छा है की राम के हाथों अपने प्राण गवाए . मारीच वन में सुनहरे रंग के हिरन का रूप धारण करता है जिसे माँ सीता देखती है और राम से अनुरोध करती है की वो उस हिरन को पकड़कर लाये , हिरन वन में भाग जाता है , राम सीता की जिद पूरी करने के लिए वन में हिरन की खोज करने जाते है और कुटिया में लक्ष्मण को छोड़ छोड़कर जाते हैं , काफी देर तक राम लौटकर नहीं आते तभी रावण राम की आवाज में चीख निकालते हैं जिसे सुनकर माँ सीता चिंतित हो जाती हैं और लक्ष्मण को कहती हैं कि जाकर देखें की कहीं राम किसी मुसीबत में तो नहीं, लक्ष्मण सीता माँ को अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे इसलिए कुटिया के चारों ओर एक रेखा खीचते हैं और सीता से कहते हैं कि ये रेखा आपकी रक्षा करेगी ,इसके बाहर किसी भी स्थिति में न जाए ,और फिर राम को खोजने वन में चले जाते हैं .अवसर पाकर रावण साधू का भेष धारण करता है और भिक्षा मांगने सीता के पास जाता है सीता उन्हें लक्ष्मण रेखा के भीतर से ही दक्षिणा देती है जिसे साधू रूप में रावण लेने से मना कर देता है, और उन्हें रेखा के बाहर आकर दक्षिणा देने को कहता है माँ सीता साधू को खाली हाथ नहीं भेजना चाहती इसलिए वो लक्ष्मण रेखा पार करती हैं जैसी वो रेखा पार करती हैं, रावण माँ सीता को उठाकर अपने पुष्पक विमान मे बैठाकर लंका ले जाता है .
4. रावण और अंगद संवाद
राम जब हिरन को मारते है तो मारीच अपने असली रूप में आ जाता है और सारी सच्चाई राम को बता देता है , राम ओर लक्ष्मण कुटिया पर लौटते है और सीता को न पाकर सीता की खोज करते है और मार्ग में उन्हें जटायु मिलते हैं जो रावण को रोकने के प्रयास में घायल हो चुके थे वो राम को आगे के मार्ग पर भेजते हैं और उन्हें इसी मार्ग पर पहले हनुमान , फिर सुग्रीव और वानर सेना का सहयोग मिलता है . हनुमान लंका में जाकर माँ सीता की खबर लेकर आते हैं और लंका पर आक्रमण करने का निवेदन करते है . राम पहले रावण को दूत भेजकर समझाने का प्रयास करना चाहते है और अंगद को दूत बनाकर भेजते हैं . अंगद जाकर रावण को समझाने का प्रयास करता है किन्तु सभी राक्षस अंगद का उपहास करते हैं और उसे लौट जाने को कहते हैं अंगद वहाँ उपस्थित सभी लोगों को चुनौती देते हैं की यदि कोई भी उसका पैर धरती से हिला देगा तो वो तुरंत ही वहां से चला जाएगा .
एक एक कर सभी राक्षस ,प्रयास करते हैं पर कोई भी अंगद का पैर नहीं उठा पाता ,तब रावण स्वयं अपने सिहांसन से उठकर अंगद का पैर उठाने को जैसे ही झुकता है अंगद अपना पैर हटा लेता है और बोलता है कि मेरे चरण पड़ने से अच्छा है श्री राम के चरण पड़े तो शायद वो उसे छमा कर दें , रावण अंगद को कैद करने का प्रयास करता है तब अंगद बोलता है की मैं तो केवल एक दूत हूँ जो श्री राम का सन्देश लेकर आया हूँ और मुझे आपका जवाब लेकर वापस जाना है . रावण राम को युद्ध करने का सन्देश भेजता है और अंगद लंका से लौट जाता है .
5. रावण वध
अंत में राम और रावण के बीच भीषण युध्ध होता है , राम कई बार रावण का सर धड से अलग कर देते हैं पर हर बार रावण का सर वापस धड से जुड़ जाता है . राम सोच में पड़ जाते हैं कि आखिर रावण को मारा कैसे जाए ,तब रावण का भाई विभिषण श्री राम को बताता है कि रावण को वरदान प्राप्त है और उसके प्राण उसकी नाभि में स्थित हैं ,वहां प्रहार करने पर ही रावण को मारा जा सकता है , अगले ही छण राम अपना तीर सीधे रावण की नाभि पर मारते है और रावण का वध कर माँ सीता को मुक्त कराते हैं .
जिस दिन राम ने रावण का वध किया वो दिन दशहरे के रूप में मनाया जाता है और हर वर्ष इस दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है .









No comments:
Post a Comment