Monday, 9 December 2013

बदलता लोकतंत्र

   लोकतंत्र  की परिकल्पना करते समय किसी ने भी इसके दूसिकरण के  विचार नहींक्या होगा , अन्यथा इस व्यवस्था के दुसपरिणामो का समाधान भी सोचा होता।  आज दिल्ली ने जो एक उदाहरण प्रस्तुत किया है लोकतंत्र का वो बहुत सराहनीय है।  लेकिन क्या कुछ ईमानदार लोगों के राजनीति में  प्रवेश मात्र से लोकतंत्र कि दशा बदल सकती है , इस बात को मान लेना कुछ मुस्किल लगता है।  जनसंघ कि स्थापना भी कुछ इसी  तरह के लोगों ने कि थी  , जो राजनीति को एक नयी दिशा देना चाहते थे , किन्तु एक लम्बे समय तक किसी भी विचारधारा को पकडे रखना अपने आप मैं एक चुनौती है।  जब संविधान कि रचना कि गयी तब कई सारे कानों बनाये गए , पर आने वाली सरकारों ने अपनी सुविधा के अनुरूप संविधान में  परिवर्तन किये।  आज आम आदमी पार्टी भी कुछ अच्छी विचारधारा के साथ राजनीति में  आयी है और आम आदमी ये उम्मीद करता है ,वो इस विचारधारा को आगे लेकर चल पाएंगे।  लेकिन क्या पुरे देश कि जनता दिल्ली कि जनता कि तरह जागरूक है , ये एक बड़ा प्रश्न है।  दिल्ली मैं कई राज्यों के लोग , अच्छी शिक्षा के सात आकर रहते हैं , आबादी इतनी घनी है कि आप अधिक से अधिक लोगों से संपर्क कर सकते है, किन्तु अन्य राज्यों मैं जहाँ जनसँख्या का घनत्व इतनअ अच्छा नहीं क्या , घर घर जाकर लोगों को जागरूक करना मुमकिन है जैसा कि डेल्ही मैं किया गया।   क्या मोबाइल के  माध्यम से  मिजोरम, आसाम , तमिलनाडु या उडीशा के लोगों का मन बदला जा सकता है , ऐसे ही कई सवाल है जिनके जवाब  आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर राजनितिक भविस्य का निर्धारण करेंगे।  आज हर एक युवा अरविन्द केजरीवाल का प्रसंशक है , चाहे वो किसी भी पर्य का मतदाता रहा हो।  क्यों किसी पर सवाल उठाना बहुत ही आसान है , और उन सवालों का जवाब देना उतना ही मुश्किल।  कुछ समय पहले जो राजनेता कहते थे कि अगर जनता आपके के साथ है तो आप चुनाव लड़के देखिये आज मानने को बाध्य हैं कि जनता केवल सही लोगों का साथ देती है , लेकिन सही लोगों को चुनने का मौका मिलना चाहिए।   अब तक समझदार लोग भारतीय जनता पार्टी को एक परिवर्तनकारी पार्टी मानते थे लेकिन आज उन्हें बीजेपी से भी बेहतर विकल्प दिखने लगा है, यही सही समय जब बीजेपी और कांग्रेस को भी साफ़ सुथरी राजनीति का परिचय देना चाहिए अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब ये दोनों रास्ट्रीय पार्टियां , राज्य स्तरीय पार्टियों मैं तब्दील हो जाएंगी।  एक और प्रश्न जो मेरे मस्तिष्क मैं आता है वो राजनीतिक चंदे का , आम आदमी पार्टी का पहला चुनाव लोगों के द्वारा दिए गए चंदे से लड़ा गया और ये चंदा लोगों ने इसलिए दिया ताकि वो एक परिवर्तन देखें और जब परिवर्तन देख लेंगे तो क्या फिर वो चंदा देंगें और अगर नहीं देंगे तो चुनाव का खर्च कहाँ से आयेगा।  केवल दिल्ली मैं चुनाव लड़ने में  २० करोड़ का खर्च हुआ २० राज्यों मैं चुनाव लड़ने का खर्च ४०० करोड़ , क्या इतना चंदा  जनता बार बार दे पायेगी, अगर नहीं तो इन खर्चो के लिए आप पार्टी के कार्यकर्ता गलत तरीकों का इस्तेमाल नहीं करेंगे?? खैर जो भी हो जिस कार्य  को करने मैं किसी पार्टी को १५ से २० वर्ष  लग जाते हैं वो आप पार्टी ने एक वर्ष में  ही कर दिखाया जो वाकई सराहनीय है और इसमें रामदेव, अन्ना  हजारे,  जैसे लोगों के योगदान को अनदेखा कर देना गलत होगा।  आज दिल्ली कि जनता का पूर्ण समर्थन आप पार्टी के साथ है, क्योंकि वो सोचती है कि ये पार्टी उनकी सारी  समस्याओं का समाधान करने में  सक्षम है।  लेकिन अगर दिल्ली मैं पुनः मतदान होता है तो सम्भावना है कि आप पार्टी ही बहुमत मैं आएगी और इसके  बाद आप के सामने  असली चुनौती  आएगी और वो है सिस्टम को सुधारने की।  केवल सही नीतियां बना देने से ही बदलाव नहीं आता , बल्कि उनके सही तरह से लागू करने से आता है।  आज गुजरात में  नरेंद्र मोदी जैसा कड़ा प्रशासक है, जिससे सभी सरकारी कर्मचारी डरते हैं, फिर भी सिस्टम कि कमजोरियों का फायदा  तो लोग उठा ही लेते हैं , मोदीजी ने  कई  नयी नीतियां लागू कि हैं लेकिन फिर भी उन नीतियों का अनुमानित लाभ नहीं हुआ है।  अरविन्द केजरीवाल के सामने एक चुनौती और  है और वो है व्यापारिक लॉबी से सम्बन्धों को  बनाये रखना।




शुभ रात्रि।  

Sunday, 8 December 2013

सरकारी तंत्र , असरकारी मंत्र

     प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में , कभी न कभी सरकारी कार्यालय से पला जरूर ही पड़ता है, चाहे वो जन्म प्रमाद पत्र बनाने हेतु हो, स्थाई निवास प्रमाण पत्र बने हेतु हो , मेडिकल सर्टिफिकेट हो या कोई अन्य कार्य हो।सरकारी काम पड़ते ही ये सोच स्वाभाविक ही आ जाती है, कि कार्य मैं अधिक समय लगेगा , और आज के भाग दौड़ भरे जीवन मैं समय की तो सबको कमी है। अब प्रश्न  यह उठता है    कि जिस कार्य के लिए समय कि आवश्यकता हो उसे करने मैं समय कैसे बचाया जाय।  यही प्रश्न कई गलत मार्ग खोल देता है।  मान लिया जाय कि मेरी प्रति घंटा आय १०० रूपये है और मुझे सरकारी ऑफिस मैं काम करवाने मैं चार घंटे लगते हैं, तो मेरे ४०० रूपये का नुक्सान हुआ , और यदि कोई व्यक्ति १०० रूपये लेकर एक घंटे मेरा काम करवा दे तो मैं निश्चित ही उसे ये राशि देने को सहमत हो जाऊँगा।  हालांकि मैं जानता हूँ कि ये गलत है , पर मेरे स्वार्थ के लिए मैं ये गलत कार्य करने को तैयार हो जाता हूँ।  और इसी से भ्रस्टाचार को बढ़ावा मिलता है।  अब प्रश्न ये उठता है कि इससे बचा कैसे जाए।  किसी भी सरकारी काम करवाने में  सबसे बड़ी समस्या  ये होती है कि , सही तरीके का ज्ञान नहीं होता।  कौन सा काम किस कर्मचारी का है यदि ये ज्ञात हो तो आप हर कार्य शीघ्रता से करवा सकते हैं।  यदि हर एक कर्मचारी कि टेबल पर उसके कार्यछेत्र का विवरण दिया हो तो, वो उस कार्य से मुकर नहीं सकता। अब एक एक ऑनलाइन डेटाबेस कि कल्पना  जिसमे एक कर्मचारी जिससे आप अपने कार्य के लिए मिले उसका  विवरण दर्ज हो तो , कर्मचारी कि  जवाबदारी निर्धारण करना कितना आसान हो जाएगा।
     हालांकि हर एक सिस्टम मैं कोई न कोई कमी जरूर होती है , जिसका फायदा लोग उठाते हैं मनमानी करने में, किन्तु ये कहना कदाचित उचित होगा , ऐसा करने मैं हम सभी भागीदार होते हैं। यदि कोई कर्मचारी आपका काम करने के लिए आपसे पैसे मांगता है तो आपको उसकी शिकायत करनी चाहिए ताकि वो अगली बार ऐसा करने कि हिमात न करे , लेकिन आज के समय कोई किसी का बुआ नहीं बनना चाहता।  इसी से ऐसे लोगों को हिमात मिलती है , ऐसी ही एक घटना मेरे साथ भी हुई।  अपने ऑफिस के सामन कि चोरी कि प्राथमिकी दर्ज करने के पश्चात मुझसे पुलिस वाले ने मुझसे चाय पानी देने को कहा मैंने उससे पूछा किस बात  का चाय पानी, उसने बोला प्राथमिकी लिकने का चार्ज , मैंने उससे कहा  सरकार इसी बात कि तनख्वाह देती हिअ , और चाय पानी कि बात एस०  पी ०  साहब से पूछ लेता हूँ , जिनका नम्बर दीवार पे लिखा हुआ था।  मेर ई बात सुनकर वो पुलिस वाला चुप हो गया और बात टालने लगा।  जागरूक लोगो का काम हर सरकारी कर्मचारी को करना ही पड़ता है। हर एक नागरिक एक ऐसा सरकारी तंत्र चाहता है जो हर काम उचित समय पर  और ईमादारी से करइ पर उसके लिए पूरी व्यवस्था  परिवर्तन कि आवश्यकता है।  हर एक कार्य कि जावबदेही आखिर मैं निचले कर्मचारी पैर थोप दी जाती है जिस कारण वो व्यक्ति काम में कम और जावबदेही से बचने में  ज्यादा ध्यान देता है।

        यदि व्यवस्था परिवर्तन के बारे मिअन कोई सुझाव हो तो अवश्य ही उस पर चर्चा होनी चाहिए , यदि कोई  सुझाव हो तो अवश्य शेयर करें।



शुभ रात्रि।  

Sunday, 1 December 2013

टेक्नोलॉजी के साइड इफेक्ट्स

> टेक्नोलॉजी के साइड इफेक्ट्स                  टेक्नोलॉजी के साइड इफेक्ट्स  दिन प्रतिदिन , बढ़ते जा रहे हैं. सही मायनों में  ,जिस मकसद से नयी खोज की जाती है , उसके अतिरिक्त कुछ ऐसे परिणाम भी आते हैं जिनकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की होती।  एक हास्यास्पद वाक्या  आप सभी लोगों के साथ बांटना चाहता हूँ.

      मैं दो तीन वर्ष  पूर्व , उत्तराखंड राज्य मैं हल्द्वानी से नैनीताल जा रहा था , मैं बस के दाएं तरफ की  सीट पर बैठा हुआ था .


 उसी बस मैं बाएं तरफ खिड़की के पास एक लड़का और उसके बगल मैं एक वृद्धआदमी बैठा हुआ था।  लड़के के कान में इअर फ़ोन लगा हुआ था। लग रहा था मानो वो संगीत सुन रहा हो , कुछ देर पश्चात वो वृद्ध आदमी  मेरे पास बैठे व्यक्ति से मोबाइल के बारे में  कुछ बात करने लगा , मैंने भी उसकी बातों पर ध्यान लगाया और मोबाइल कि बुराइयां सुनने लगा।

     वो व्यक्ति बोल रहा था कि  इस मोबाइल ने झूठ बोलना कितना आसान कर दिया है, अगर कोई आदमी आपके पड़ोस मैं भी हो तो वो आपको बतायेगा कि, अभी वो बाहर  है मिल नहीं सकता।  बात तो सही थी , फिर वो बोला इस मोबाइल ने तो आजकल के बच्चों को भी बिगाड़के रख दिया है , रात दिन बस मोबाइल से चिपके रहते हैं, दुनिया कि कोई सुध ही नहीं है उन्हें।  फिर से एक बार मैं इस बात से सहमत था क्योंकि मैंने भी कई लोगों को मोबाइल से घंटों चिपके हुए देखा था ।  फिर वो बोला लड़कियों को तो मोबाइल देना ही नहीं चाहिए,  इस मोबाइल की  वजह से ही आजकल कि लड़कियों केघर से भागने के केस बढ़ रहे हैं।  इसी दौरान मैं ये सोचने लगा कि ये वृद्ध आदमी इस मोबाइल के बारे में  क्यों बात कर रहा है, वो भी एक अनजान आदमी के साथ जो केवल उसकी बस में सफ़र कर रहा  है , इस पूरे वार्तालाप के दौरान वो लड़का इन सभी बातों से अनजान अपने मोबाइल के साथ व्यस्त था।  नैनीताल अब समीप ही था तभी उस लड़के और वृद्ध आदमी के बीच कुछ बात हुई थोड़ी देर में वृद्ध आदमी कि आवाज तेज होने लगी , और सभी लोगों का ध्यान उसकी तरफ गया , वो आदमी उस लड़के को डांटने लगा कि तुम्हें शर्म नहीं आती इतनी देर से लड़की से बात कर रहा है, कैसी बात कर रहा है , माँ बाप ने इसलिए मोबाइल दिया है,  जैसे ही बस रुकी लोगों ने उस वृध्ध आदमी को समझा कर उतार दिया ,मुझे उस लड़के पर  भी दया आ रही थी क्योंकि वो समझ ही नहीं पाया कि बिना किसी के बात के उसे डांठ क्यों पड़ गयी,  और उस आदमी के बच्चों  पर भी तरस आ रहा था शायद उन्हें अब मोबाइल नहीं मिलेगा।


शुभ रात्रि।  

Saturday, 30 November 2013

आज पहली बार ब्लॉग लिख रहा हूँ इसलिए , शुभारम्भ एक कविता से करना चाहता हूँ ,
                    " चाहता हूँ मैं कि एक मुस्कान सबके पास हो ,
                      हर मुस्किल घड़ी मैं  कोई अपना  पास हो। 
                      कहाँ किसी को मिल सका जो चाहता वो दिल से है,
                     राहें जो हों खुशनुमा , मजा कहाँ मंजिल  में  है।  "

  इससे आगे कुछ सूझ नहीं रहा मित्रो हो सके आगे कुछ पंक्तियाँ  जोड़ो , देखते हैं कितनी लम्बी कविता बनती है। अभी के लिए शुभ रात्रि।