Sunday, 20 January 2019

भारत या भारतवर्ष कैसे पड़ा भारत का यह पुरातन नाम

यद्यपि भारत को हिन्दुस्तान , इंडिया के नाम से भी जान जाता है किन्तु आदिकाल से भारत या भारतवर्ष नाम से जाना जाता  है .जिसका जिक्र वेद और पुराणों में भी मिलता है .अब प्रश्न यह उठता है की यह नाम पड़ा कैसे ओर क्यूँ ?

बर्बरीक , एक योध्धा जिसने देखा महाभारत का युद्ध कटे हुए सिर के साथ .
कौन थे रामायण के रचयिता वाल्मीकि?

कैसे पड़ा भारत नाम


भारत का वर्तमान नाम कैसे पड़ा इस विषय बहुत सी मान्यताएं है इनमें से सबसे प्रमुख है ,हिन्दू चक्रवर्ती  सम्राट भरत के सन्दर्भ में.ऐसी मान्यता है,कि भरत एक बहुत तेजस्वी सम्राट थे और उन्होंने पूरे भारतवर्ष पर एकछत्र राज्य किया था और उनके नाम पर उनके साम्राज्य का  नाम भारत पड़ा .



कौन थे राजा भरत 


देवी शकुंतला और रजा दुष्यंत के प्रेम प्रसंग में अधिकांश भारतीय हिंदी नाटकों के माध्यम से जानते  ही है . देवी शकुंतला ऋषि विश्वामित्र और देव सुंदरी मेंनका की संतान थी . मेनका देव लोक लौटते समय शकुंतला को जंगल में छोड़ गयी जिसे ऋषि कन्व ने पाला.एक समय राजा दुष्यंत शिकार के लिए जंगल में विचरण कर रहे थे और उन्होंने शकुंतला को देखा और देखते ही मोहित हो गये और शकुन्तला के सम्मुख प्रेम प्रस्ताव रखा जिसे शकुंतला ने स्वीकार कर लिया दोनों ने वन में ही गंधर्व विवाह कर लिया और कुछ दिन उसकी कुटिया में  ही रुक गये .उस समय ऋषि कन्व किसी कार्य से कुछ दिनों के लिए बाहर गये हुए थे  . दुष्यन्त ने शकुंतला को अपने साथ चलने को कहा ,किन्तु अपनी पिता की आज्ञा के बिना शकुंतला ने आने से मना  कर दिया ,राजा ने कहा जब भी वे उनके पास आना चाहे आ सकती है उनकी रानी बनके राजमहल में रह सकती है और दुष्यंत अपने राज्य लौट गये

एक दिन रिही दुर्वाषा शकुंतला के आश्रम में पहुचे ,तब शकुंतला रजा दुष्यंत के खयालो में खोयी हुई थी और ऋषि दुर्वासा का स्वागत नहीं किया  ,ऋषि दुर्वाषा ने  क्रोध में शकुंतला की शाप दिया की , " जिस के खयालो में तुम ऐसे खोयी हो वो तुम्हें पूरी तरह से भूल  जाएगा .शकुंतला ने तब क्षमा प्रार्थना की. ऋषि दुर्वाषा ने कहा शाप को वापस लेना संभव नहीं तब उन्होंने शकुंतला एक तेजस्वी बालक का वरदान दिया .

कुछ समय में शकुन्ता गर्भवती हो गयी , जब ऋषियों दुष्यंत के बारे में ज्ञात हुआ वे शकुंतला को लेकर दुष्यंत के आश्रम में गये किन्तु शाप के प्रभावस्वरूप वो शकुंतला को भूल चुके थे शकुंतला आश्रम वापस लौट आई और एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम भरत रखा .भारत बाल्यकाल में जंगल के शेरो के साथ खेला करते थे 

आगे चलकर भरत एक चक्रवर्ती सम्राट बने और उनके नाम पर उनके साम्राज्य का नाम भारत पडा.

एक अन्य मत के अनुसार भारत नाम, नृत्यकला   "भरतनाट्यम " से लिया गया है , "भा " भावम से अर्थात भाव और "र " रागम" से  अर्थात  सुर  से ओर "त" तालम से अर्थात संगीत से .यह परिकल्पना पुरातन भारतवर्ष के निवासियों की विविधता में छुपी हुई एकता को प्रदर्शित करती है .



Saturday, 29 December 2018

बर्बरीक , एक योध्धा जिसने देखा महाभारत का युद्ध कटे हुए सिर के साथ .

॰महाभारत के अनूठे किरदार बर्बरीक 

वैसे तो महाभारत की कथा एक से बड़कर एक योद्धाओं और किरदारों से भरी  पड़ी है किन्तु इन सभी में  से सबसे अनूठा किरदार है बर्बरीक का ।

कौन थे बर्बरीक 

बर्बरीक भीम के पोते और महाबली घटोत्कच व नागकन्या अहिलावती के पुत्र थे । अहिलावती ने अपने पुत्र को अच्छे संस्कार  देकर पाला , उन्होने बर्बरिक को ये शिक्षा दी की कभी भी कमजोर व्यक्ति से युद्ध न करे ,सदा कमजोर व्यक्ति का सहयोग करे । बर्बरीक मात्रभक्त था और वो सदैव कमजोर व्यक्ति की ओर से लड़ता था । बर्बरीक को दैवीय शक्तियाँ प्राप्त  थी और वो पालक झपकते ही युद्ध का परिणाम बदल सकता था ।

बर्बरीक की कथा 

बर्बरीक को बाल्मीकी द्वारा तीन दिव्य बाण प्राप्त हुए थे जो किसी भी युद्ध को जीतने में पर्याप्त थे और ये बाण बर्बरीक के तरकश में  लौटकर वापस आ जाते थे । इन्हीं बाण की वजह से  "उन्हें तीन बांणधारी  " भी कहा जाता है ।

महाभारत के युध्ध की सूचना मिलते ही बर्बरीक यूध्ध में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की और अपनी माता से आशीर्वाद लेने पहुचे तब माँ को हारte हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। 
बर्बरीक के विषय में ज्ञात होते ही  श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर  बर्बरीक को मार्ग में रोका और उनके तीन बाणों के साथ युध्ध में शामिल होने पर हसी उड़ाई तब बर्बरीक ने उन्हें अपने एक बाण द्वारा समस्त सेना को मार गिराने का दावा किया और कहा कि तीन बाणों को प्रयोग में लिया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जाएगा तक कृष्ण ने उसे चुनौती दी कि ऐसा है तो इस पीपल के व्रक्ष के सभी पत्तों को छेदकर दिखाओ ।
 कृष्ण ने चालाकी कर एक पत्ते को अपने पैर के नीचे दबा दिया । बर्बरीक ने एक बाण से सभी पत्तों को छेद दिया और बाण श्रीकृष्ण के चरणों के चक्कर लगाने लगा तब बर्बरीक ने कहा कि अपना पैर हटा लीजिये अन्यथा ये बाण आपको नुकसान पहुचा सकता है कृष्ण ने ज्यों ही पैर हटाया बाण ने उस पत्ते को भी छेद दिया और तरकश में लौट गया ।

यह सब देखकर कृष्ण अचंभित रह गए ,और बर्बरीक से पूछा कि तुम किसकी ओर से युध्ध लड़ोगे ,तो बर्बरीक ने बताया कि वो अपनी माँ को वचन देकर आया है कि जो भी युध्ध हार रहा होगा मैं उसकी ओर से युध्ध करूंगा ।

कैस हुई बर्बरीक कि मृत्यु 

जब कृष्ण को बर्बरीक की शक्ति का पता  चला वो सोचने लगे कि यदि ये युध्ध में शामिल हुआ तो कौरवो कि ओर से लड़ेगा और युध्ध का परिणाम बदल जाएगा  ।तब कृष्ण ने बर्बरीक से कहा कि वो उससे एक दान चाहता है क्या वो उसे ये दान दे सकता है ?

महर्षि दधिची का बलिदान 




 क्यूंकि कृष्ण ब्राह्मण वेश में थे अतः बर्बरीक ने ब्राह्मण को दान देने का वचन दे दिया । कृष्ण ने बर्बरीक को अपना शीश दान करने को कहा , एक पल के लिए बर्बरीक असमंजस में फस गए, किन्तु अपना वचन निभाने को मान गए और उन्होने कृष्ण से अपना वास्तविक रूप दिखने को कहा । श्री कृष्ण ने बर्बरीक को अपना विराट रूप दिखाया । 

उन्होंने बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमि की पूजा के लिए एक वीरवर क्षत्रिय के शीश के दान की आवश्यकता होती है, उन्होंने बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतएव उनका शीश दान में मांगा। 



कैसे देखा बर्बरीक ने महाभारत का युध्ध 


बर्बरीक ने श्रीकृष्ण से  प्रार्थना की, कि वह अंत तक महाभारत युद्ध देखना चाहता है, श्रीकृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को बर्बरीक ने  अपने शीश का दान दिया। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया, जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।



महाभारत युध्ध समाप्त होने के पश्चात पांडवों में ये बहस होने लगी की इस यूध्ध में विजय का श्रेय किसे दिया जाये , तब  श्रीकृष्ण ने कहा ये बात बर्बरीक के शीश से ही  पूछना  चाहिये क्यूंकि वो इस पूरे युद्ध का साक्षी है बर्बरीक ने उत्तर दिया इस युद्ध में सर्वाधिक योगदान श्रीकृष्ण का है जिन्होने अपनी कूटनीति, राजनीति से पाण्डवों की जीत सुनिश्चित की, मुझे हर जगह श्रीकृष्ण का सुदर्शन शत्रुओं का नाश करता हुआ ही दिखायी दिया. सभी लोग बर्बरीक की बात से सहमत हो गए और बहस समाप्त हो गई. 

बर्बरीक ने अपनी माता को दिए वचन और ब्राह्मण वेश में श्री कृष्ण को दिए हुए वचन के निर्वहन के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए , इसीलिए श्री कृष्ण ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ योध्धा की उपाधि दी . 

Wednesday, 26 December 2018

क्यों मनाया जाता है ,१ जनवरी को नव वर्ष


जनवरी को ही क्यों  मनाया जाता है, नव वर्ष

विश्व के अधिकाँश देशों में , नव वर्ष जनुअरी को मनाया जाता है यद्यपि भारत में अलग अलग धर्मो और स्थान के अनुसार अलग अलग तिथियों पर नव वर्ष मनाया जाता है  ,किन्तु जनवरी को सभी लोग सामान रूप से मनाते हैं


नव वर्ष का इतिहास

ऐसा अनुमान है कि नव वर्ष मनाने का प्रारम्भ ,जुलिअस सीजर द्वारा ईशा से ४५ वर्ष पूर्व ग्रेगरियन केलिन्डर बनाने से हुई , इस केलिन्डर के अनुसार जनवरी वर्ष का प्रथम दिन था और इसे नव वर्ष के रूप में मनाया जाने लगा .

एक अन्य मान्यता के अनुसार जनवरी महीने का नाम रोम के एक देवताजानूसके नाम पर पड़ा जिसके दो  मुह थे एक सामने की तरफ और एक पीछे की तरफ था  , इसलिए वो भूतकाल और भविष्य काल के बारे में सब जानते थे , उनके नाम पर ही जनवरी को वर्ष का प्रथम माह माना  गया और जनवरी को नववर्ष मनाया जाने लगा .

इसके अलावा कुछ लोग ये भी मानते है की जनवरी माह से दिन का बड़ा होना प्रारम्भ हो जाता है इसलिए जनवरी को नववर्ष मनाया जाता है .


क्या सभी देशो में नव वर्ष जनवरी को मनाया जाता है?

ऐसा बिलकुल भी नहीं है ,भारत में वर्ष में एक बार नहीं बल्कि कई बार नववर्ष मनाया जाता है ,गुजरात में दीपावली के अगले दिन , तो पारसी , पंजाब में बैसाखी से नए वर्ष की शुरुआत होती है तो महारास्ट्र  में मार्च अप्रैल के आस पास पड़ने वाले गुडी पड़वा को नव वर्ष मनाया जाता है , तो हिन्दू धर्म के अनुसार चैत्र माह की प्रतिपदा से नव वर्ष का शुभारम्भ माना जाता है .

भारत ही नहीं कुछ अन्य देश भी हैं जो जनुवरी को नव वर्ष नहीं मनाते जैसे की इसराइल और पारसिया में 20 सितम्बर को तो ग्रीक में 20 दिसम्बर को नव वर्ष मनाने का रिवाज है .


कैसे मनाया जाता है नव वर्ष


३१ दिसम्बर की रात १२ बजते ही नए वर्ष का आगमन हो जाता है और पूरे विस्वा में आतिशबाजो शुरू हो जाती है , लोग नाचते गाते हैं और एक दुसरे को बधाईयाँ देते हैं . लोग नए वर्ष कुछ नया करने,स्वयं में कुछ सुधार लाने जैसे संकल्प भी लेते हैं , हालांकि कुछ ही लोग ऐसे संकल्प को पूरा करते हैं , फिर भी ये एक प्रथा के समान है .

नए वर्ष में एक दुसरे से  मिलने और बधाई देने का दौर कुछ दिनों तक जारी रहता है . बहुत से लोग नव वर्ष पर छुट्टियाँ मनाने  सैर पर निकल जाते हैं , भारत में गोवा एक ऐसी जगह है जहां नव वर्ष के समय विदेशी पर्यटकों की भारी भीड़ दिखाई देती है .

नव वर्ष का आकर्षण 

नव वर्ष का मुख्य आकर्षण है , ३१ दिसम्बर १२ बजे होने  वाली आतिशबाजी . ऑस्ट्रेलिया, होन्ग-कोंग,दुबई, मास्को ,लन्दन , रिओ दे जिनारियो आदि स्थानों पर अलग ही रौनक रहती है  जिसे पूरे विश्व में देखा जाता है. 

नव वर्ष का बदलता स्वरुप

समय के साथ नव वर्ष का स्वरुप भी बदलता जा रहा है. शोर शराबे और नशे की बढती प्रवर्ती ने इस उत्सव को विलासिता से भरा उत्सव बना दिया है . नयी पीढ़ी द्वारा ऐसी प्रवत्ति को बड़ी शीघ्रता से अपना लिया जाता है . नशे की हालत में वाहन चलाने के कारण ३१ दिसम्बर की रात बहुत सी दुर्घटनाएं भी होती हैं.



कई स्थानों पर महिलाओं से छेड़ छाड़ की घटनाएं भी होती हैं . 

"नव-वर्ष बीते हुए कल की परेशानियों , कठिनायों को भुलाने और आने वाले कल के सुन्दर भविष्य की कामना के लिए मनाये जाने वाला एक दिन हैं और यही इस दिन को एक ख़ास दिन बनाता है ." 



Friday, 21 December 2018

अपेक्षा दुख का कारण

क्या है दुख का कारण? 


यद्यपि मानव जीवन में अनेकों कठिनाइयां आती है किन्तु यदि प्रत्येक कठिनाए पर हम दुखी होने लगे तो जीवन जीना अत्यंत ही कठिन हो जाएगा . अधिकाँश लोग जीवन कि छोटी मोटी परेशानियों को आसानी से सहन कर लेते हैं . किन्तु बिना किसी परेशानी के दुखी होना काफ़ी आश्चर्यजन्क लगता है .

सुनने में भले ही अटपटा लगे किन्तु कई बार हम ऐसी बातों पर दुखी होते हैं जिसमे हम कोई परेशानी  का सामना नहीं करते. ऐसे दुख  का मूल कारण है अपेक्षा ! हाँ सही पढ़ा आपने, यह अपेक्षा ही है जो सभी लोगों को दुख देती है चाहे वो अमीर हो, या गरीब. 

गीता में कृष्णा ने कहा है कि , "कर्मण्ये वाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन " अर्थात कर्म करो पर फल कि चिंता न करो . कृष्णा अर्जुन को समझाते है कि अपेक्षा रखने से हम भविष्य के परिणाम को परिवर्तित नहीं कर सकते किन्तु कर्म करने से कर सकते हैं. यदि अपेक्षा ही न हो तो  परिणाम कुछ भी आये , इस बात का आप पर कोई असर नहीं होगा ना ही आप दुखी होगे ना  ही खुश .

सुनने में तो ये  बहुत आसान प्रतीत होता है कि कोई अपेक्षा न राखी जाए क्या वास्तव ये इतना आसान है . यदि ये इतना आसान होता तो शायद ही  कोई मनुष्य दुखी होता . किन्तु यदि थोड़ा भी हम इस पर अमल कर पायें तो इससे  हमारे मन का बोझ कुछ हल्का जरूर हो सकता है .

इस बात का  प्रतिवाद यह कहकर भी किया जा सकता है कि यदि कोई भी इंसान अपेक्षा नहीं रखे तो वो कर्म कैसे करेगा. जैसे कि एक वैज्ञानिक एक नयी खोज में सफल होने कि  अपेक्षा ही न रखे तो वो कैसे प्रयोग करेगा , यदि अच्छे  मकान  की कल्पना ही न की  जाये तो ,कारीगर कैसे अच्छे भवन का निर्माण करेगा ? यह बात भी सर्वथा सत्य है किन्तु लक्ष्य बनाना और अपेक्षा रखना दोनों बातों में अंतर है।  अच्छे  भवन का निर्माण एक लक्ष्य  है जिसके लिए निरंतर कार्य करना पड़ेगा और अधिक पूंजी कि आवश्यकता होगी , जिसके लिए मेहनत कर पूंजी बनानी पड़ेगी, किंतु उपयुक्त पूंजी के बिना अच्छे  भवन  के  निर्माण की अपेक्षा रखना दुख का कारण है।

यह नियम प्रत्येक  जगह लागू होता है ,अपने परिवार में भी। बदलते समय के साथ परिवार के सदस्यों के बीच भी संवादहीनता बढ़ती जा रही है , हर कोई अपने काम में व्यस्त है , फेसबूक और व्हात्सप्प ने जैसे हमें बात करना ही भुला दिया है  । हम सभी से ये अपेक्षा करते हैं कि वो हमारी इच्छा को प्राथमिकता दे, चाहे वो पति हो, पत्नी हो, पिता ही, माता हो या फिर बच्चे. इसी अपेक्षा से होने वाले दुख से बचने के लिए परिवार के सदस्य भी एक दूसरे से दूर हुए जा रहे हैं. इसी संवादहीनता का नतीजा है कि हम भावनात्मक रूप से कमजोर और संवेदनहीन होते जा रहे हैं.

कितने ही किससे आज हेडलाइन में सुनाई देते जहाँ एक व्यक्ति सड़क पे तड़प रहा  हो और लोग उसकी मदद करने  के स्थान पर उसकी फोटोग्राफ निकालते हैं.
यहां भी व्यक्ति ये अपेक्षा रखता है कि कोई और आकर उस व्यक्ति की मदद करे  किंतु यह अपेक्षा  अब उसकी नहीं दूसरे के दूख का कारण बनती है. 

समाधान 

अपेक्षाओं पर नियंत्रण और कर्म को प्राथमिकता देने से बहुत हद तक हम अपने और दूसरो के दुख को कम कर सकते हैं.