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Thursday, 29 November 2018

महर्षि दधिची की कथा


महर्षि दधिची मनुष्य ही नहीं देवताओं के लिए भी आदरणीय हैं. जिन्होंने असुरों से देवताओं की रक्षा के लिए अपना शरीर त्याग दिया था . दधिची ऋषिअथर्वाऔरचित्तिके पुत्र थे इसलिए उनका नाम दधिची पडा .



ऋषि दधिची बहुत ज्ञानी , तपस्वी और वेदों के ज्ञाता थे . स्वभाव से  अत्यंत दयालु ऋषि दधिची ने अपनी तपस्या से बहुत शक्तियां  प्राप्त की थी और निरंतर तप करने के कारण उनका शरीर दिव्य शक्तियों से भरा हुआ था . महर्षि दधीचि तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। ऋषि दधिची भगवान शिव के परम भक्त थे .

वृत्रासुर राक्षस और देवता


वृत्रासुर अत्यंत  ही ताकतवर राक्षश था , जिसने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को परस्त कर दिया देवताओं के किसी भी अस्त्र का  वृत्रासुर पर कोई असर नहों होता था यहाँ तक की देवराज इन्द्र के वज्र भी वृत्रासुर को नुक्सान नहीं पहुच सका , तब सभी देवता अपनी समस्या लेकर शिव, विष्णु और ब्रह्मा के पास गये और उनसे वृत्रासुर का वध करने का निवेदन किया किन्तु कोई फायदा नहीं हुआ किन्तु ब्रह्मा जी ने देवताओं के एक उपाय बताया की , पृथ्वी पर दधिची नाम के तपस्वी ऋषि हैं जिनकी अस्थियों में ही इतना तेज और  सामर्थ्य है कि वृत्रासुर का वध कर सके .यह बात सुनकर सभी देवता सोच में पड़ गये कि जीवित ऋषि दधिची की अस्थियों को कैसे प्राप्त करेंगे तब ब्रह्मा जी ने देवताओं से कहा कि ये बात स्वयं ऋषि दधिची से ही पूछनी चाहिए.

ऋषि द्वारा अस्थियों का दान


सभी देवता बड़े ही संकोच के साथ ऋषि दधिची के आश्रम में पहुचे ,अचानक देवताओं के इस तरह से अपने आश्रम में देखकर ऋषि दधिची कुछ समझ नहीं पाए और उन्होंने सभी देवताओं का स्वागत किया और उनके अचानक आगमन का कारण पूछा. अत्यंत संकोच के साथ  देवराज इंद्र ने ब्रह्मदेव द्वारा बताई गयी बात बतायी .दधिची ने सारी बात सुनी और अपनी अस्थियों का दान देने को तैयार हो गये. ऋषि दधिची ने समाधि लगाई और अपने प्राण त्याग दिए .

उस समय उनकी पत्नी आश्रम में नहीं थी। अब देवताओं के समक्ष ये समस्या आई कि महर्षि दधीचि के शरीर के माँस को कौन उतारे। इस कार्य के ध्यान में आते ही सभी देवता सहम गए। तब इन्द्र ने कामधेनु गाय को बुलाया और उसे महर्षि के शरीर से मांस उतारने को कहा। कामधेनु ने अपनी जीभ से चाट-चाटकर महर्षि के शरीर का माँस उतार दिया। अब केवल अस्थियों का पिंजर रह गया था।

वृत्रासुर का वध


ऋषि दधिची की अस्थियों से दराज इन्द्र ने वज्र का निर्माण किया , और फिर इसी वज्र से देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया और देवता वृत्रासुर के आतंक से मुक्त हुए .

ऋषि दधिची की पत्नी गभस्तिनी की जिद


ऋषि दधिची की पत्नी का नाम गभस्थिनी था जिस समय ऋषि दधिची ने अपना देह त्याग किया उस समय गभस्थिनी आश्रम में नहीं थी वापस आकर जब उन्हने अपने पति की मृत देह को देखा तो उन्होंने सती होने की जिद की . उस समय गभस्थिनी गर्भवती थी इसलिए सभी देवताओं ने उनसे अपने वंश की रक्षा हेतु सती होने का निवेदन किया किन्तु गभस्थिनी नहीं मानी तब देवताओं ने उनसे अपना गर्भ देवों को दान देने का निवेदन किया और इस बात के लिए गभस्थिनी मान गयी और अपने  गर्भ का दान कर सती हो गयी .उस गर्भ को बचने के लिए उस गर्भ को देवताओं ने पीपल के वृक्ष के भीतर प्रत्यारोपित किया , और जब गर्भ से पुत्र का जन्म हुआ , पीपल से जन्म होने के कारण उसका नामपिप्पलादरखा गया .








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