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Friday, 30 November 2018

परम विदुषी गार्गी



परम विदुषी गार्गी


ईसा से लगभग ७००-८००  वर्ष पूर्व गर्ग वंश के ऋषि वचक्नु थे जो वेदों के जज्ञाता थे ओर वेदों का पठन पाठन किया करते थे , वचक्नु की पुत्री का नाम वाचकन्वी था ,गर्ग वंश में पैदा होने के कारण उन्हें गार्गी भी कहा जाता है . गार्गी की रूचि बाल्यावस्था से वैदिक साहिया में अत्यधिक रुचि थी अतः वो अपने पिता से वेदों का ज्ञान लेने लगी . ऋषि वचक्नु के आश्रम में नियमितशास्त्रथ किया जाता था जिसमें गार्गी भी भाग लिया करती थी .

महर्षि दधिची की कथा 

 ऋषि याज्ञवलक्य के साथ शास्त्रार्थ


वृहदारण्यक उपनिषद में एक अत्यंत ही रोचक शास्त्रार्थ का वर्णन है , ऋषि याज्ञवलक्य और गार्गी के मध्य .राजा जनक जो की एक दानी राजा थे उन्होंने एक बार सोने से १००० गायों का निर्माण कराया और सभी ब्राह्मणों को आमंत्रण भेजा . सभी ब्राह्मणों के बीच राजा ने ये घोषणा कि आप में से जो भी सबसे अधिक ज्ञानी है वो ही ये गायें ले जा सकता है . कुछ देर तक वहाँ शांति छाई रही , क्यूंकि ये निर्णय कैसे हो की सबसे अधिक ज्ञानी कौन है  .तभी ऋषि याज्ञवलक्य ने अपने शिष्यों से कहा की इन गायों को अपने आश्रम ले चलो . इस सभा गार्गी भी मौजूद थी , उन्हें ये सब समझ नहीं आया. तभी सभी ऋषि याज्ञवलक्य से शास्त्रथ करने लगे किन्तु याज्ञवलक्य बड़ी ही आसानी से सभी को उतार देने लगे तब गार्गी उठ कड़ी हुई और उन्होंने याज्ञवलक्य से शास्त्रथ करने की अनुमति मांगी जिसे सभी ब्राह्मणों से सहमती दे दी . तत्पश्चात गार्गी ने ऋषि याज्ञवलक्य से प्रश्न पूछना प्रारम्भ किया , गार्गी ने पुछा कि, ये समस्त पार्थिव पदार्थ जिस प्रकार जल मे ओतप्रोत हैं, उस प्रकार जल किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- जल वायु में ओतप्रोत है।
गार्गी- वायु किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- वायु आकाश में ओतप्रोत है।
गार्गी- अन्तरिक्ष किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- अन्तरिक्ष गन्धर्वलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- गन्धर्वलोक आदित्यलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- आदित्यलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- आदित्यलोक चन्द्रलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- चन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- नक्षत्रलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- नक्षत्रलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- देवलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- देवलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- प्रजापतिलोक में ओतप्रोत है।
गार्गी- प्रजापतिलोक किसमें ओतप्रोत है?
याज्ञवल्क्य- ब्रह्मलोक में ओतप्रोत है।

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 इतने सारे प्रश्न सुनकर ऋषि याज्ञवलक्य कई बार क्रोधित भी हो जाते किन्तु गार्गी बड़ी ही विनम्रता से अगला प्रश्न ऋषि के सामने प्रस्तुत कर देती . गार्गी के सभी प्रश्नों का ऋषि याज्ञवलक्य ने जवाब दे दिया अंत गार्गी संतुष्ट होगर बोली इण गायों को ले जाने की योग्यता आप ही रखते है गुरुवर .जिस प्रकार श्री कृष्ण और अर्जुन के मध्य वार्तालाप से गीता का निर्माण हुआ , उसी प्रकार विदुषी गार्गी और ऋषि याज्ञवलक्य के मध्य हुए शास्त्रथ से ही ववृहदारण्यक उपनिषद का निर्माण हुआ .यह उपनिषद वेदों का हिस्सा है .

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विदुषी गार्गी का योगदान


एक पुरुष प्रधान समाज में समय समय पर स्त्रियों ने अपनी अलग पहचान बनायी . विदुषी गार्गी ऐसी ही कुछ महिलाओं में शामिल है, जिन्होंने रूढिवादी मान्यताओं को गलत साबित किया और पुरुषों के सामन स्त्रियों की योग्यता और क्षमता का प्रदर्शन किया .विदुषी गार्गी ने ज भी प्रश्न ऋषि याज्ञवलक्य से किये उन सभी प्रश्नों के उत्तर गार्गी स्वयं भी जानती थी, किन्तु उन्हें इस बात का ज़रा भी अहंकार नहीं था .
विदुषी गार्गी ने विवाह नहीं किया और आजीवन ब्रह्मचारिणी रही .

Thursday, 29 November 2018

महर्षि दधिची की कथा


महर्षि दधिची मनुष्य ही नहीं देवताओं के लिए भी आदरणीय हैं. जिन्होंने असुरों से देवताओं की रक्षा के लिए अपना शरीर त्याग दिया था . दधिची ऋषिअथर्वाऔरचित्तिके पुत्र थे इसलिए उनका नाम दधिची पडा .



ऋषि दधिची बहुत ज्ञानी , तपस्वी और वेदों के ज्ञाता थे . स्वभाव से  अत्यंत दयालु ऋषि दधिची ने अपनी तपस्या से बहुत शक्तियां  प्राप्त की थी और निरंतर तप करने के कारण उनका शरीर दिव्य शक्तियों से भरा हुआ था . महर्षि दधीचि तपस्या और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थे। ऋषि दधिची भगवान शिव के परम भक्त थे .

वृत्रासुर राक्षस और देवता


वृत्रासुर अत्यंत  ही ताकतवर राक्षश था , जिसने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को परस्त कर दिया देवताओं के किसी भी अस्त्र का  वृत्रासुर पर कोई असर नहों होता था यहाँ तक की देवराज इन्द्र के वज्र भी वृत्रासुर को नुक्सान नहीं पहुच सका , तब सभी देवता अपनी समस्या लेकर शिव, विष्णु और ब्रह्मा के पास गये और उनसे वृत्रासुर का वध करने का निवेदन किया किन्तु कोई फायदा नहीं हुआ किन्तु ब्रह्मा जी ने देवताओं के एक उपाय बताया की , पृथ्वी पर दधिची नाम के तपस्वी ऋषि हैं जिनकी अस्थियों में ही इतना तेज और  सामर्थ्य है कि वृत्रासुर का वध कर सके .यह बात सुनकर सभी देवता सोच में पड़ गये कि जीवित ऋषि दधिची की अस्थियों को कैसे प्राप्त करेंगे तब ब्रह्मा जी ने देवताओं से कहा कि ये बात स्वयं ऋषि दधिची से ही पूछनी चाहिए.

ऋषि द्वारा अस्थियों का दान


सभी देवता बड़े ही संकोच के साथ ऋषि दधिची के आश्रम में पहुचे ,अचानक देवताओं के इस तरह से अपने आश्रम में देखकर ऋषि दधिची कुछ समझ नहीं पाए और उन्होंने सभी देवताओं का स्वागत किया और उनके अचानक आगमन का कारण पूछा. अत्यंत संकोच के साथ  देवराज इंद्र ने ब्रह्मदेव द्वारा बताई गयी बात बतायी .दधिची ने सारी बात सुनी और अपनी अस्थियों का दान देने को तैयार हो गये. ऋषि दधिची ने समाधि लगाई और अपने प्राण त्याग दिए .

उस समय उनकी पत्नी आश्रम में नहीं थी। अब देवताओं के समक्ष ये समस्या आई कि महर्षि दधीचि के शरीर के माँस को कौन उतारे। इस कार्य के ध्यान में आते ही सभी देवता सहम गए। तब इन्द्र ने कामधेनु गाय को बुलाया और उसे महर्षि के शरीर से मांस उतारने को कहा। कामधेनु ने अपनी जीभ से चाट-चाटकर महर्षि के शरीर का माँस उतार दिया। अब केवल अस्थियों का पिंजर रह गया था।

वृत्रासुर का वध


ऋषि दधिची की अस्थियों से दराज इन्द्र ने वज्र का निर्माण किया , और फिर इसी वज्र से देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया और देवता वृत्रासुर के आतंक से मुक्त हुए .

ऋषि दधिची की पत्नी गभस्तिनी की जिद


ऋषि दधिची की पत्नी का नाम गभस्थिनी था जिस समय ऋषि दधिची ने अपना देह त्याग किया उस समय गभस्थिनी आश्रम में नहीं थी वापस आकर जब उन्हने अपने पति की मृत देह को देखा तो उन्होंने सती होने की जिद की . उस समय गभस्थिनी गर्भवती थी इसलिए सभी देवताओं ने उनसे अपने वंश की रक्षा हेतु सती होने का निवेदन किया किन्तु गभस्थिनी नहीं मानी तब देवताओं ने उनसे अपना गर्भ देवों को दान देने का निवेदन किया और इस बात के लिए गभस्थिनी मान गयी और अपने  गर्भ का दान कर सती हो गयी .उस गर्भ को बचने के लिए उस गर्भ को देवताओं ने पीपल के वृक्ष के भीतर प्रत्यारोपित किया , और जब गर्भ से पुत्र का जन्म हुआ , पीपल से जन्म होने के कारण उसका नामपिप्पलादरखा गया .