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Wednesday, 21 November 2018

क्या है देव दिवाली और क्यूँ मनाई जाती है


देव दिवाली (बूढी दिवाली)


देव दिवाली दीपावली ( अमावस्या) के १५ दिनों के पश्चात कार्तिक मॉस की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है. देव दिवाली का मुख्य आकर्षण वाराणसी है  .कुछ स्थानों पर इसे बूढी दिवाली भी कहा जाता है . वैसे अधिकांश भारतीय इसे मनाते है किन्तु वाराणसी में देव दिवाली की अलग ही चमक देखने को मिलती . वाराणसी भोलेनाथ शिव की नगरी है , गंगा तट पर स्थित वाराणसी में देव दिवाली के दिन गंगा नदी के घाटो को दीपों  से सजाया जाता है और शिव की पूजा की जाती है .




क्यूँ मनाई जाती है देव दिवाली


देव दिवाली के पीछे एक कथा प्रचलित है, पौराणिक कथा के अनुसार त्रिपुराशुर नाम का एक राक्षस था जो बहुत ही शक्तिशाली था और उसने तीनो लोको पर अधिकार कर लिया था , सभी देवता उससे भयभीत होकर भगवान् शिव की शरण में गये , तब भोलेनाथ ने देवताओं को भयमुक्त करने और त्रिपुराशुर से बचाने के लिए , उससे युद्ध किया और उसका वध कर दिया . त्रिपुराशुर का वध करने के कारण ही सही को त्रिपुरारी  भी कहा जाता है .इसी विजय दिवस को देव दिवाली के रूप मैन्मनाय जाता है .

क्या है देव दिवाली का महत्त्व


देव दिवाली के दिन वाराणसी में गंगा नदी के घाटों को दीपों से  सजाया जाता है . ऐसी मान्यता है की इस दिन भगवान् शिव की पूजा करने सभी देवता अवतरित होते  है इसलिए इस दिन का विशेष महत्व है . देश विदेश से यात्री इस दिन वाराणसी घूमने आते हैं घाटों और गंगा नदी में तैरते लाखों दीपों की चमक देखते ही बनती है .लोग भी अपने घरों के बाहर दीप जलाकर रोशनी करते हैं . कई मंदिरों में इस दिन मेले का आयोजन होता मंदिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ रहती है 
वर्ष  2018 में  देव दिवाली का २३ नवम्बर को (पूर्णिमा) के दिन मनाया जाएगा .


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