हिन्दू सभ्यता में मानव जाती को चार मुख्या वर्णों में बांटा गया था. यानि की समाज को कर्म के आधार पर चार भागों में बांटा क्या जो कालांतर में जन्म आधारित विभाजन में परिवर्तित हो गे . ये वर्ना हैं:-
१. ब्राह्मण .
२. क्षत्रिय .
३. वैश्य .
4. शुद्र.
प्रत्येक वर्ण का अपना अलग महत्त्व था , जिसे विस्तार से समझते हैं-
ब्राह्मण
यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: -- ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर का ज्ञाता"। इन्हें विप्र या द्विज भी खा जाता है .
यद्यपि ऐसा कहा जाता है कि ब्राह्मण वह है जो इश्वर को जानता है , या जो ईश्वर तक पहुचने का मार्ग जानता है , किन्तु वास्तविकता यह की ब्राह्मण वे लोग थे जो अपनी जीविका के लिए अपने ज्ञान (मस्तिष्क) का उपयोग करते थे . समाज में शिक्षा देने का कार्य ब्राह्मण किया करते थे, अर्थात ब्राह्मण मुख्य रूप से शिक्षक थे जो वेदों का पठन पाठन कराते थे और उनकी बुद्धिमता के कारण ही उन्हें समाज में सबसे ऊँचा स्थान दिया गया . अधिकाँश राजा अपने सलाहकार का पद ब्राह्मणों को दिया करते थे.
ब्राह्मण समाज में अपनी श्रेष्ठता के कारण सदैव सम्मान के अधिकारी रहे,इसलिए ब्राह्मणों में धैर्य अर्थात सहनशक्ति की सदैव कमी रही है . भगवान् परशुराम , जिन्हें भगवान् शिव का अंश माना जाता है ब्राह्मणों के अराध्य हैं .
ब्राह्मणों में भी बहुत से वर्गीकरण है. बहुत से राज्यों में स्थान के नाम से वर्गीकरण है , बहुत सी जगह गोत्र के आधार पर.
स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद को यज्ञोपवीत के आध्यात्मिक अर्थ में बताया गया है,
- जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते।
- शापानुग्रहसामर्थ्यं तथा क्रोधः प्रसन्नता।
अतः आध्यात्मिक दृष्टि से यज्ञोपवीत के बिना जन्म से ब्राह्मण भी शुद्र के समान ही होता है। ब्राह्मण बहुत ही अनुसाशनप्रिय और दृढ़प्रतिज्ञ होते है और देश की उन्नति में सदैव अपना योगदान दिया है .
क्षत्रिय
क्षत्रिय वो कहलाये जिनके सर पे क्षत्र था अर्थात जो राजकुल में जन्मे . जो लोग भुजाओं का प्रयोग अधिक करते वो ही क्षत्रिय कहलाये इनका मुख्या कर्म युद्ध करना और राज्य की रक्षा करना था . क्षत्रिय अपने राज्य और प्रजा की रक्षा में अपना सर्वस्व बलिदान कर देते थे और बाकी सभी वर्णों पर इनका ही नियंत्रण था .
ऋग्वैदिक कालीन शासन प्रणाली में सम्पूर्ण कबीले का प्रमुख "राजन" कहलाता था व राजन की पदवी वंशानुगत नहीं होती थी। कबीले की समिति जिसमें महिलाएं भी भागीदार होती थीं, राजा का सर्व सहमति से चयन करती थी। कबीले के जन व पशुधन (गाय) की रक्षा करना राजन का कर्तव्य था। राजपुरोहित राजन का सहयोगी होता था। प्रारंभिक दौर में अलग से कोई सेना नहीं होती थी परंतु कालांतर में शासक व सैनिकों के एक पृथक वर्ग का उदय हुआ। उस समय समाज के चार वर्णों में विभाजन की प्रणाली नहीं थी
क्षत्रिय ही राज्यों के एकीकरण और सामूहिक उन्नति के लिए उत्तरदायी थे .
वैश्य
वैश्य वर्ग का मुख्य कार्य व्यापार करना था , ऐसा माना जाता है वैश्यों की उत्पति ब्रह्मा जी के उदर से हुई . ये आहार यानी अनाज संबंधी व्यापार अधिक करते थे अर्थात मानव शरीर के पेट वाले भाग से ही इनकी जीविका चलती थी .ये वर्ग बनिया वर्ग भी कहलाता है .
शुद्र
चार वर्णों में अंतिम वर्ना शुद्र है ,इनका कार्य अन्य तीन वर्णों की सेवा करना और शिल्प-कला के काम करना माना गया है। यजुर्वेद में शूद्रों की उपमा समाजरूपी शरीर के पैरों से दी गई है; इसीलिये कुछ लोग इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से मानते हैं। अर्थात बाकी सभी वर्ण इन पर निर्भर थे . मकान का निर्माण हो, या किले का निर्माण , या घर के बर्तन , इन सभी का निर्माण शुद्र्ण द्वारा ही किया जाता था . अर्थात यह वर्ग मेहनत वाले सारे कार्य किया करते थे .
कालांतर में शूद्र भी जाति के आधार पर बंट गये और दलित व पिछड़े जैसे कई शब्द इनसे जुड़ गये .जिसका शुद्र शब्द से कोई सीधा संबंध नहीं था .
सीधे शब्दों में कहा जाए तो प्रत्येक व्यक्ति में ये चारों वर्ण हैं , उसके कर्म के आधार पर ही उसका वर्ण निर्धारण होता है .किन्तु यह दुर्भाग्य है कि जो वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी वो जाति आधारित हो गयी .
लोगों ने अपने कर्म को अपना जन्मसिद्ध मानकर अपनी अगली पीढ़ी को उसी क्षेत्र में आगे बढाया . इससे कुछ वर्ग तो काफी उन्नत हो गये किन्तु एक वर्ग काफी कमजोर हो गया ओर अछूत मान जाने लगा , उनको मौलिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया . भारत की आजादी के समय यह स्थिति भयावह थी .इस वर्ग को उनके अधिकार दिलाने और सक्षम बनाने के लिए ही आजादी के बाद भारत के संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया ताकि यह पिछड़ा वर्ग आगे आ सके . यह आरक्षण प्रारम्भ में १० वर्षों के लिए दिया गया था ताकि इसके प्रभाव का अध्ययन कर आवश्यक शुधार किये जा सकें .
किन्तु आज तक यह व्यवस्था निरंतर आगे बढ़ रही है . आरक्षण का लाभ इन जातियों को मिल तो रहा है परन्तु इसमें भी एक हिस्सा ही निरंतर लाभ लेता जा रहा है इसलिए समाज में जो बदलाव डॉ. भीमराव अंबेडकर लाना चाहते थे वो बदलाव आजादी के ७१ वर्ष बाद भी नहीं आ पाया है .
सूत्र: विकिपीडिया .
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