नवरात्र यानी 9 विशेष रात्रियां। इस समय शक्ति के 9 रूपों की उपासना का श्रेष्ठ काल माना जाता है। 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक है।
प्रत्येक संवत्सर (साल) में 4 नवरात्र होते हैं जिनमें विद्वानों ने वर्ष में 2 बार नवरात्रों में आराधना का विधान बनाया है। विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से 9 दिन यानी नवमी तक नवरात्र होते हैं। ठीक इसी तरह 6 माह बाद आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी यानी विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक देवी की उपासना की जाती है। सिद्धि और साधना की दृष्टि से से शारदीय नवरात्र को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इस नवरात्र में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति के संचय के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं।
Navratri(Durga Pooja) 2018 india(नवरात्री ,दुर्गा पूजा)
मुख्यत: शक्ति की उपासना आदिकाल से चली आ रही है। वस्तुत: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के अंतर्गत देवासुर संग्राम का विवरण दुर्गा की उत्पत्ति के रूप में उल्लेखित है। समस्त देवताओं की शक्ति का समुच्चय जो आसुरी शक्तियों से देवत्व को बचाने के लिए एकत्रित हुआ था, उसकी आदिकाल से आराधना दुर्गा-उपासना के रूप में चली आ रही है।
नवरात्री भारत के विभिन्न राज्य में अलग अलग प्रकार से मनाई जाती है , जिसमे से सबसे प्रसिद्ध है गुजरात का गरबा और बंगाल की दुर्गा पूजा । गुजरात में स्त्री और पुरुष मिलकर रात्रि में एक स्थान पर एकत्रित होते है जहाँ पर पहली नवरात्री को गरबी की स्थापना की जाती है और नों दिनों तक गरबी के चारों ओर घूमकर लोकनृत्य गरबा करते हैं।
बंगाल में दुर्गा पूजा की अलग ही धूम रहती है , मुख्यतया स्त्रियाँ ही दुर्गा पूजा में शामिल होती हैं , औरतें एक दुसरे को गुलाल लगाती हैं ।
कुछ लोग नवरात्री के दिनों में नों दिन का उपवास करते हैं और , पांच अथवा नौ बालिकाओं को भोजन कराने के बाद अपना व्रत खोलते हैं। नवरात्री के नौं दिनों में देवी के नौं स्वरूपों की पूजा की जाती और विभिन्न व्यंजनों का भोग माँ को लगाया जाता है ।आइये ज्जनते हैं कैसे करें नौं दिन देवी की पूजा -
प्रतिपदा तिथि- नवरात्रि का पहला दिन प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है। इस दिन माता के पहले स्वरूप मां शैल पुत्री की आराधना की जाती है। प्रतिपदा तिथि पर मां शैलपुत्री को शुद्ध देसी घी का भोग लगाएं। इससे रोगों से मुक्ति मिलती है।
द्वितीया तिथि- इस दिन देवी के ब्रह्राचारिणी रूप की पूजा होती है। द्वितीया तिथि पर देवी को शक्कर और फल का भोग लगाकर दान करें इससे दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है।
तृतीया तिथि- इस तिथि पर देवी के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा होती है इस दिन दूध से बनी चीजों का भोग लगाने और उसका दान करने से मां प्रसन्न होती है सभी तरह के दुखों का नाश करती हैं।
चतुर्थी तिथि- नवरात्रि की इस तिथि पर देवी को मालपुए का भोग लगाना चाहिए और प्रसाद को ब्राह्राण को दान करें। इससे बुद्धि और कौशल का विकास होता है साथ ही निर्णय क्षमता में बढ़ोतरी होती है।
पंचमी तिथि- यह तिथि मां स्कंदमाता को समर्पित होती है। इस दिन माता दुर्गा को केले का भोग लगाना चाहिए और दान करना चाहिए इससे बुद्धि का विकास होता है।
षष्ठी तिथि- माता को इस तिथि पर शहद का भोग लगाना चाहिए। इस तिथि पर मधु से पूजन का विशेष महत्व होता है। शहद के भोग से सुंदर काया का निर्माण होता है।
सप्तमी तिथि- इस तिथि पर भगवती को गुड़ का भोग लगाना चाहिए और उसका दिन ब्राह्राण को करना चाहिए ऐसा करने से व्यक्ति शोक मुक्त होता है।
अष्टमी तिथि- इस तिथि पर मां दुर्गा को नारियल का भोग लगाना चाहिए और इसका दान करना चाहिए। इससे हर तरह की पीड़ा का शमन होता है। ऐसा करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है।
नवमी तिथि- नवमी तिथि पर माता को अलग- अलग तरह के अनाजों से बनी चीजों का भोग लगाया जाता है और फिर उसे दान किया जाता है। इसे जीवन में सुख और समृद्धि आती है। साथ ही दशमी तिथि को काले तिल का भोग अर्पित कर देने से परलोक का भय नहीं रहता।
" वैसे तो नवरात्री माँ दुर्गा की भक्ति का एक त्योहार् हैं किन्तु ये हिन्दू सभ्यता में नारी जाति को दिए जाने वाले सम्मान को दर्शाता है जिसे समय के साथ भुला दिया गया "
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