द्रोणाचार्य ऋषि भारद्वाज तथा घ्रितार्ची नामक अप्सरा के पुत्र थे तथा धर्नुविद्या में निपुण परशुराम के शिष्य थे। हस्तिनापुर के राजकुमारों , पांडु के पाँचों पुत्र तथा ध्रितराष्ट्र के सौ पुत्रों के वे गुरु थे.
जन्म कथा
द्रोणाचार्य का जन्म कथा बेहद ही रोचक है , एक कथा के अनुसार ऋषि भारद्वाज ब्रह्म मुहुर्त में नदी में स्नान करने गये हुए थे , उसी समय उन्होंने घृताची नाम की अप्सरा को नग्नावस्था में स्नान करते हुए देखा ,जिससे वो कामोत्तेजित हो उठे और उनका वीर्य स्खलित हो गया जिसे उन्होंने एक द्रोंण कलश में रखा, जिससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ हुआ और उसका नाम द्रोणचार्य पडा
, एक अन्य मत के अनुसार ऋषि भारद्वाज ने घृताची से सम्बन्ध बनाए और घृताची ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम द्रोणाचार्य पडा.
महर्षि दधिची की कथा
महर्षि दधिची की कथा
शिक्षा दीक्षा
द्रोणाचार्य की प्रारम्भिक शिक्षा ऋषि भारद्वाज के आश्रम में हुई और सभी विध्याओं में निपुण बने . उन्हीं दिनों परशुराम अपनी समस्त सम्पत्ति को ब्राह्मणों में दान करके महेन्द्राचल पर्वत पर तप करने जा रहे थे थे। यह सुन कर द्रोण उनके पास पहुँचे और उनसे दान देने का अनुरोध किया। इस पर परशुराम बोले, "वत्स! तुम विलम्ब से आये हो, मैंने तो अपना सब कुछ पहले से ही ब्राह्मणों को दान में दे डाला है। अब मेरे पास केवल ये अस्त्र-शस्त्र ही शेष बचे हैं। तुम चाहो तो उन्हें दान में ले सकते हो।" द्रोण यही तो चाहते थे अतः उन्होंने कहा, "हे गुरुदेव! आपके अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर के मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी, किन्तु आप को मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने की शिक्षा भी देनी होगी तथा विधि-विधान भी बताना होगा।" इस प्रकार द्रोणपरशुराम के शिष्य बन कर द्अस्त्र-शस्त्र आदि सहित समस्त विद्याओं के अभूतपूर्व ज्ञाता हो गये.
विवाह एवं परिवार
शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात द्रोण अपने गुरु परशुराम से आज्ञा लेकर लौट
आये , तत्पश्चात उनका विवाह क्रिपाचार्य की बहन कृपी से हुआ . कृपी ने एक पुत्र को
जन्म दिया जिसका नाम अश्वस्थामा पडा जो की महाभारत का एक बहुत प्रसिध्ध किरदार
बनकर उभरा .द्रोणाचार्य ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना जानते थे . उन्होंने अपने पुत्र को सभी विद्याओं में
निपुण तो बनाया ही साथ ही ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना भी सिखाया और अश्वस्थामा ने
इसका प्रयोग अपने पिता द्रोण की हत्या बदला लेने के लिए अर्जुन पर किया .
राजगुरु द्रोणाचार्य
एक बार बाल्यावस्था में कुरान और पांडव गुल्ली डंडा खेल रहे थे और उनकी
गुल्ली कुँए में गिर गयी . सभी बालक गिल्ली को ऊपर से देख रहे थे तभी वहाँ से
द्रोणाचार्य गुजर रहे थे उन्होंने बालकों को कुँए के पास कड़े देखकर उनसे इसका कारण
पूछा , तब उन्होंने इन बालको की गुल्ली निकालने के लिए पास में पड़ी सीक को
अभिमंत्रित किया और सीक के द्वारा गुल्ली को बांधकर कुँए से बाहर निकाल दिया , इस
बात की सूचना जब पितामह भीष्म को मिली तो वो तुरंत उस स्थान पर पहुचे द्रोणाचार्य
का परिचय लिया . यह जानकार की उन्होंने परशुराम से शिक्षा ली है, उन्हें कौरव और
पांडवों का राजगुरु बनने का आग्रह किया जिसे द्रोणाचार्य ने स्वीकार कर लिया .
सभी
राजकुमारों के साथ उन्होंने अपने पुत्र अश्वस्थामा को भी शिक्षा दी किन्तु जब
बालकों को पानी भरने का कार्य देते तब अपने पुत्र को बड़ा पत्र देते जिससे वो अपने
हिस्से का जल जल्दी भर देता और पहले आकर शिक्षा लेना प्रारम्भ कर देता , अर्जुन जो
की द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे वो इस बात
को जान गये और वरुणास्त्र का प्रयोग कर जल्दी जल भर देते और जल्दी ऋषि द्रों के
पास पहुच जाते इसलिए अर्जुन किसी भी विद्या में अश्वस्थामा से कम नहीं थे .
महाभारत में द्रोणाचार्य और उनका वध
महाभारत में द्रोणाचार्य ने महाराज ध्रितराष्ट्र के आज्ञा अनुसार कौरवों की
तरफ से युध्ध में भाग लिया और उन्हें सेनापति बनाया गया , द्रोणाचार्य और उनके
पुत्र अश्वस्थामा ने पांडवों की सेना को बुरी तरह से पराजित करना प्रारम्भ कर दिया
जिससे बचने के लिए श्री कृष्ण ने एक योजना बनायी .
युध्ध में अश्वस्थामा नाम का एक हाथी
था जिसे पांडवों ने मार डाला गया ,और यह समाचार फैलाया गया की अश्वस्थामा मारा गया
, द्रोणाचार्य को इस बात पर बिकुल भी विश्वास नहीं हुआ क्यूंकि उन्हें अपने पुत्र
की योग्यता पर पूर्ण विश्वास था , तब उन्होंने युधिष्ठिर से पूछा जो की धर्मराज कहलाते थे और कभी भी असत्य नहीं बोलते थे . युधिष्ठिर ने द्रोणाचार्य को कहा यह
सत्य है कि .”अश्वस्थामा मारे गये , किन्तु हाथी” .द्रोणाचार्य
ने जैसे ही आधी बात सुनी ,अश्वस्थामा मारे गए ,श्री कृष्ण ने शंखनाद कर दिया , द्रोणाचार्य
ये नहीं सुन पाए कि जो मारा गया वो हाथी था और शस्त्र त्यागकर विलाप करने लगे.
सुअवसर देखते हुए ध्रिष्टदयुम्न ने द्रोणाचार्य के शीष को धड
से अलग कर दिया , ऐसी मान्यता है कि ध्रिष्टदयुम्न को राजा द्रुपद ने देवों की अराधना कर , द्रोणाचार्य का नाश करने के लिए ही प्रज्वलित अग्नि से प्राप्त किया था . द्रोणाचार्य के वध
के बाद पांडवो ने कौरवों को परास्त करना प्रारम्भ कर दिया .किन्तु अस्वस्थामा ने अपने
पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए छुपकर द्रौपदी के पांच पुत्रों का वध कर
दिया , और ध्रिष्टदयुम्न का भी वध कर दिया था .


No comments:
Post a Comment