क्यूँ मनाई जाती है दीपावली?
माना जाता है कि दीपावली के दिन
अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के
वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे थे।अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से
प्रफुल्लित हो उठा था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए।कार्तिक मास की सघन काली
अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय
प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर अक्टूबर या नवम्बर महीने में पड़ता
है।
कैसे मनाई जाती है दीपावली ?
कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग
अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का
कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। दीपावली से पहले
ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं
धनतेरस से दीपावली
की शुरुवात हो जाती है , माँ लाक्स्मिकी उपासना की जाती है , दीपावली के दिन
महालक्ष्मी का पूजन किया जाता है . अयोध्या
के राजा राम भगवान् श्री विष्णु के अवतार
थे और भगवान् विष्णु की पत्नी लक्ष्मीजी धन की देवी हैं अतः घर में समृधि हेतु माँ
लक्ष्मी की पूजा की जाती है .चारो तरफ मिटटी के दिए जलाकर रौशनी की जाती है आजकल बिजली की लडियां लगाकर घर को
रौशनी से जगमगा दिया जाता है, पटाखों द्वारा आतिशबाजी भी की
जाती है .
दिवाली के दौरान बाजरों की चहल पहल देखते ही बनती है , व्यापारी वर्ग विशेष रूप से दिवाली के लिए उत्साहित रहता है अधिक से अदिक व्यापार करने का प्रयास करता है ताकि उसकी दिवाली भी अच्छे से मने .घर के सदस्यों के लिए नए परिधान बनाये जाते हैं . गरीब से गरीब व्यक्ति भी प्रयास करता है की वो दिवाली पे नए वस्त्र और मिठाइयाँ ख़रीदे.
छोटे बच्चों को विभिन्न प्रकार के पटाखे जलाने की अलग ही लगन होती है और दिवाली का बड़ी ही बेसब्री से इन्तेजार करते हैं .
वर्तमान में दीपावली का महत्व
वैसे तो दीपावली रौशनी का त्यौहार है जो अधर्म पर धर्म की , अन्याय पर न्याय की जीत को प्रदर्शित करता है. नए दौर में मिटटी की दीपक की जगह बिजली से जलने वाली लड़ियों ने ले ली है , घर बनने वाली सुध्ह देसी देशी घी की मिठाइयों की जगह बाजार में उपलब्ध मिठाइयों ने ले ली है . इस दौर में जब अधिकाँश नौकरीपेशा लोग अपने घरों से दूर रहते है. दीपावली का त्यौहार अपने परिवार से मिलने का एक अवसर बन गया है . दीपावली के दौरान सभी वाहनों में भीड़ भाद का नजारा आम बात है. दीपावली में लोग अपने सगे सम्बन्धियों से मिलते है , एक दुसरे को उपहार देते है ,चरों ओर सर्दी की आहात से मौसम खुशनुमा हो जाता है .
गुजरात में दीपावली के बाद वाला दिन नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है , दीपावली के अगले पांच दिन लोग अपने सम्बन्धियों से मिलने और सैर सपाटे पे निकल जाते है , बाजार में सन्नाटा पसरा रहता है .
भले ही आज लोग एक दुसरे से कितने ही दूर और व्यस्त हों दीपावली जैसे त्यौहार हमें अपनों के महत्व को याद दिलाते है .आपसी प्रेम और लगाव से ही कोई त्यौहार असली मायनों में मनाया जा सकता है .
दीपावली के नकारात्मक प्रभाव
वैसे तो दिवाली हर्ष और उल्लाष का त्यौहार है लेकिन बढती जनसँख्या के कारण दिवाली पर बहुत ज्यादा आतिशबाजी होती है जिसके कारण इस वायु प्रदुषण काफी हद तक बाद जात है . जिससे बड़े सहरों में जहाँ घनी आबादी है दिवालिके दिनों में श्वसन सम्बन्धी परेशानियां बढ़ जाती हैं. अत्यधिक पटाखे जलने से ध्वनि प्रदूशण भी होता है जिससे छोटे बच्चों और बीमार व्यक्तियों को तकलीफ होती है .
इन सब बातों का सारांश ये है की दीपावली प्रकाश का पर्व है ,असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है . दिवाली हमें अपनों से मिलने और उनसे अपने सम्बन्ध बेहतर करने का एक मौका देती है . क्यूँ न इस दिवाली हम खुद को और अपने समाज को बेहतर मनाने प्राण लें .


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