Monday, 5 November 2018

क्यूँ और कब मनाया जाता है धनतेरस का त्यौहार ?


कब मनाया जाता है धनतेरस का त्यौहार ?


कार्त‍िक मास के कृष्‍ण पक्ष की त्रयोदशी यानी कि 13वें दिन धनतेरस का पर्व मनाया जाता है. इस दिन मां लक्ष्‍मी, भगवान गणेश, कुबेर देवता और धन्‍वंतरि भगवान की पूजा की जाती है.वर्ष 2018 में धनतेरस 5 नवम्बर को है और दीपावली ७ नवम्बर को है .


क्यूँ मनाया जाता है धनतेरस ?


धनतेरस से संबंधित कई प्रचलित कथाएं हैं. इसमें से एक कहानी ऐसी भी है जिसमें यह उल्‍लेख है कि भगवान विष्‍णु ने मां लक्ष्‍मी को शाप दिया था और इसी कारण धनतेरस का त्‍योहार मनाया जाता है.

एक बार भगवान विष्‍णु के मन में विचार आया कि उन्‍हें मृत्‍यु लोक का एक बार भ्रमण करना चाहिए. यह विचार आते ही उन्‍होंने मां लक्ष्‍मी को बताया. मां लक्ष्‍मी ने कहा क्‍यों ना मैं भी आपके साथ चलूं.
इस पर भगवान विष्‍णु ने कहा कि इसमें मुझे कोई आपत्‍त‍ि नहीं है, लेकिन वहां आप मेरे कहे अनुसार ही चलेंगी. मां लक्ष्‍मी ने कहा, ठीक है. मैं आपके कहे अनुसार ही चलूंगी.

भगवान विष्‍णु और मां लक्ष्‍मी दोनों मृत्‍युलोक यानी कि धरती पर पहुंच गए. कुछ दूर जाने के बाद भगवान विष्‍णु ने मां लक्ष्‍मी से कहा कि आप कुछ क्षण यहां प्रतिक्षा करें. मैं जब तक लौटकर ना आऊं, आप कहीं नहीं जाइएगा.

मां लक्ष्‍मी ने उस वक्‍त तो हां कर दिया, पर कुछ क्षण रुकने के बाद वो भी भगवान विष्‍णु के पीछे चल पड़ीं.


भगवान विष्‍णु दक्ष‍िण दिशा की ओर गए थे, इसलिए मां लक्ष्‍मी भी उसी दिशा की ओर जाने लगीं. तभी रास्‍ते में उन्‍हें पीले-पीले सरसों के लहलहाते खेत दिखे. मां लक्ष्‍मी अति प्रसन्‍न हो गईं और उन्‍होंने सरसों के फूल से अपना खूब श्रृंगार किया.
इसके बाद गन्‍ने के खेत आए, मां लक्ष्‍मी ने गन्‍ने तोड़कर चूसने लगीं. तभी वहां भगवान विष्‍णु आ गए.उन्‍होंने मां लक्ष्‍मी से कहा कि आपने मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया और किसान के खेत में चोरी भी की है, इसलिए आपको श्राप देता हूं कि आपको इस किसान के घर 12 वर्ष रुक कर उसकी सेवा करनी होगी.

इतना कहने के उपरांत भगवान विष्‍णु क्षीरसागर चले गए. मां लक्ष्‍मी 12 वर्षों तक किसान के घर रुक कर उसकी सेवा करने लगीं और किसान का घर धन धान्‍य से भर गया.
13वें वर्ष जब भगवान विष्‍णु लक्ष्‍मी जी को लेने आए तब किसान ने मां लक्ष्‍मी को विदा करने से मना कर दिया.
भगवान विष्‍णु ने समझाया कि मां लक्ष्‍मी कहीं भी एक जगह रुक नहीं सकतीं. वह चंचला हैं. फिर भी किसान यह मानने को तैयार नहीं था.

तभी मां लक्ष्‍मी को एक युक्‍त‍ि सूझी. उन्‍होंने कहा कि कल तेरस के दिन तुम अपने घर की अच्‍छे से साफ सफाई करो. इसके बाद शाम में घी का दीपक जलाकर मेरी पूजा करो. तांबे के एक कलश में सिक्‍के भरकर मेरे लिए रखना, मैं उसी कलश में निवास करूंगी. ऐसा करने से मैं तुम्‍हारे घर में फिर एक वर्ष के लिए निवास करूंगी.


मां लक्ष्‍मी ने जैसा बताया था, किसान ने ठीक वैसे ही किया. किसान के घर में धन धान्‍य दोबारा लौट आया. वह हर वर्ष तेरस के दिन ऐसे ही पूजन करने लगा और उसके घर में मां लक्ष्‍मी का वास हो गया. इसके बाद से हर साल कार्त‍िक मास के कृष्‍ण पक्ष की तेरस को धनतेरस का त्यौहार मनाया जाता है.

ऐसी भी मान्‍यता है कि इस दिन भगवान धन्‍वंतरि का जन्‍म हुआ था, इसलिए इस दिन बड़े उत्‍साह के साथ धनतेरस का त्‍योहार मनाया जाता है.


शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि विष्णु के अंशावतार हैं। संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने धन्वंतरि का अवतार लिया था। भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। 


कैसे मनाते हैं धनतेरस ?


धनतेरस के दिन माँ लक्ष्मी के प्रतीक  स्वरुप सोने या चांदी के सिक्के या आभूसण की खरीद की जाती है , जो लोग सोना या चांदी नहीं खरीद सकते वो लोग बर्तन भी खरीदते हैं.  



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