Friday, 21 December 2018

अपेक्षा दुख का कारण

क्या है दुख का कारण? 


यद्यपि मानव जीवन में अनेकों कठिनाइयां आती है किन्तु यदि प्रत्येक कठिनाए पर हम दुखी होने लगे तो जीवन जीना अत्यंत ही कठिन हो जाएगा . अधिकाँश लोग जीवन कि छोटी मोटी परेशानियों को आसानी से सहन कर लेते हैं . किन्तु बिना किसी परेशानी के दुखी होना काफ़ी आश्चर्यजन्क लगता है .

सुनने में भले ही अटपटा लगे किन्तु कई बार हम ऐसी बातों पर दुखी होते हैं जिसमे हम कोई परेशानी  का सामना नहीं करते. ऐसे दुख  का मूल कारण है अपेक्षा ! हाँ सही पढ़ा आपने, यह अपेक्षा ही है जो सभी लोगों को दुख देती है चाहे वो अमीर हो, या गरीब. 

गीता में कृष्णा ने कहा है कि , "कर्मण्ये वाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन " अर्थात कर्म करो पर फल कि चिंता न करो . कृष्णा अर्जुन को समझाते है कि अपेक्षा रखने से हम भविष्य के परिणाम को परिवर्तित नहीं कर सकते किन्तु कर्म करने से कर सकते हैं. यदि अपेक्षा ही न हो तो  परिणाम कुछ भी आये , इस बात का आप पर कोई असर नहीं होगा ना ही आप दुखी होगे ना  ही खुश .

सुनने में तो ये  बहुत आसान प्रतीत होता है कि कोई अपेक्षा न राखी जाए क्या वास्तव ये इतना आसान है . यदि ये इतना आसान होता तो शायद ही  कोई मनुष्य दुखी होता . किन्तु यदि थोड़ा भी हम इस पर अमल कर पायें तो इससे  हमारे मन का बोझ कुछ हल्का जरूर हो सकता है .

इस बात का  प्रतिवाद यह कहकर भी किया जा सकता है कि यदि कोई भी इंसान अपेक्षा नहीं रखे तो वो कर्म कैसे करेगा. जैसे कि एक वैज्ञानिक एक नयी खोज में सफल होने कि  अपेक्षा ही न रखे तो वो कैसे प्रयोग करेगा , यदि अच्छे  मकान  की कल्पना ही न की  जाये तो ,कारीगर कैसे अच्छे भवन का निर्माण करेगा ? यह बात भी सर्वथा सत्य है किन्तु लक्ष्य बनाना और अपेक्षा रखना दोनों बातों में अंतर है।  अच्छे  भवन का निर्माण एक लक्ष्य  है जिसके लिए निरंतर कार्य करना पड़ेगा और अधिक पूंजी कि आवश्यकता होगी , जिसके लिए मेहनत कर पूंजी बनानी पड़ेगी, किंतु उपयुक्त पूंजी के बिना अच्छे  भवन  के  निर्माण की अपेक्षा रखना दुख का कारण है।

यह नियम प्रत्येक  जगह लागू होता है ,अपने परिवार में भी। बदलते समय के साथ परिवार के सदस्यों के बीच भी संवादहीनता बढ़ती जा रही है , हर कोई अपने काम में व्यस्त है , फेसबूक और व्हात्सप्प ने जैसे हमें बात करना ही भुला दिया है  । हम सभी से ये अपेक्षा करते हैं कि वो हमारी इच्छा को प्राथमिकता दे, चाहे वो पति हो, पत्नी हो, पिता ही, माता हो या फिर बच्चे. इसी अपेक्षा से होने वाले दुख से बचने के लिए परिवार के सदस्य भी एक दूसरे से दूर हुए जा रहे हैं. इसी संवादहीनता का नतीजा है कि हम भावनात्मक रूप से कमजोर और संवेदनहीन होते जा रहे हैं.

कितने ही किससे आज हेडलाइन में सुनाई देते जहाँ एक व्यक्ति सड़क पे तड़प रहा  हो और लोग उसकी मदद करने  के स्थान पर उसकी फोटोग्राफ निकालते हैं.
यहां भी व्यक्ति ये अपेक्षा रखता है कि कोई और आकर उस व्यक्ति की मदद करे  किंतु यह अपेक्षा  अब उसकी नहीं दूसरे के दूख का कारण बनती है. 

समाधान 

अपेक्षाओं पर नियंत्रण और कर्म को प्राथमिकता देने से बहुत हद तक हम अपने और दूसरो के दुख को कम कर सकते हैं. 

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