Friday, 7 December 2018

कौन थे रामायण के रचयिता वाल्मीकि?


आदिकवि वाल्मीकि

आदिकवि शब्द 'आदि' और 'कवि' के मेल से बना है। 'आदि' का अर्थ होता है 'प्रथम' और 'कवि' का अर्थ होता है 'काव्य का रचयिता' वाल्मीकि ने संस्कृत के प्रथम महाकाव्य की रचना की थी जो रामायण के नाम से प्रसिद्ध है। प्रथम संस्कृत महाकाव्य की रचना करने के कारण वाल्मीकि आदिकवि कहलाये। 
वाल्मीकि रामायण महाकाव्य की रचना करने के पश्चात आदिकवि कहलाए। वे भील परिवार में पैदा हुए थे ऐसी मान्यता है .


अपने महाकाव्य "रामायण" में अनेक घटनाओं के घटने के समय सूर्य , चन्द्र  तथा अन्य नक्षत्र की स्थितियों का वर्णन किया है। इससे ज्ञात होता है कि वे ज्योतिष  विद्या एवं खगोल  विद्या के भी प्रकाण्ड ज्ञानी थे।
अपने वनवास काल के समय  "राम" वाल्मीकि के आश्रम में भी गये थे।
देखत बन सर सैल सुहाए। वाल्मीक आश्रम प्रभु आए॥
तथा जब "राम " ने अपनी पत्नी सीता का परित्याग कर दिया तब महर्षि वाल्मीक ने ही सीता को आसरा दिया था।
उपरोक्त उद्धरणों से सिद्ध है कि वाल्मीकि को "राम" के जीवन में घटित प्रत्येक घटनाओं का पूर्णरूपेण ज्ञान था। उन्होने विष्णु को दिये श्राप को आधार मान कर अपने महाकाव्य "रामायण" की रचना की।


वाल्मीकि का जीवन परिचय

आदिकवि वाल्मीकि के जन्म होने का कहीं भी कोई विशेष प्रमाण नहीं मिलता है। सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों कालों में वाल्मीकि का उल्लेख मिलता है वो भी वाल्मीकि नाम से ही।
एक मान्यता के अनुसार महर्षि वाल्मीकि का असली नाम रत्नाकर था कहा जाता है कि इनका पालन पोषण भील समुदाय में हुआ था। हालांकि एक और कथा के अनुसारमहर्षि  वाल्मीकि का जन् महर्षि कश्यप और अदिति के नवम पुत्र वरुण से हुआ था। इनकी माता का नाम चर्षणी था और भृगु को इनका भ्राता बताया गया है। उपनिषद में मौजूद विवरण के अनुसारमहर्षि  वाल्मीकि को अपने भाई भृगु की तरह ही परम ज्ञान प्राप् हुआ था। 
एक मान्यता के अनुसार रत्नाकर को एक भील दम्पति चुराकर वन में ले आई और उनका पालन पोषण किया , रत्नाकर अपना और परिवार का जीवन यापन करने के लिए वन से गुजरने वाले राहगीरों को लूटने और मारने लगा और डाकू बन गया .

रत्नाकर कैसे बना वाल्मीकि

एक दिन नारद जी वन से गुजर रहे थे और रत्नाकर ने उन्हें पकड़ लिया और धन देने को कहा , नारद जी ने रत्नाकर से कहा धन तो में दे दूंगा पहले ये तो बताओ, तुम जो ये पाप करते हो इसमें तुम्हारे अलावा भी कोई भागीदार है ? रत्नाकर ने जवाब दिया कि , हाँ मेरा परिवार है . नारदजी ने कहा ऐसा तुम मानते हो लेकिन कभी तुमने अपने परिवार से पुछा कि तुम्हारे द्वारे किये पाप में वो भागीदार बनने को तैयार हैं , रत्नाकर ने जवाब दिया नहीं . नारदजी बोले अच्छा तो तुम अभी पूछ लो , मैं यहाँ तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ.
रत्नाकर बड़ी ही जिज्ञासापूर्वक पहले अपनी माता ,फिर अपनी पत्नी से ये प्रश्न पूछता है की वो उसके पाप में भागीदार बनने को तैयार है कि नहीं , दोनों ही पाप का भागी बनने से मुकर जाती हैं . रत्नाकर उदास और दुखी होकर नारदजी के पास पंहुचता है और नारदजी को पूरी जानकारी देकर पूछता है कि मैं अपने पापों से कैसे मुक्ति पा सकता हूँ , नारदजी कहते है कि ये तो बस राम ही बता सकते है और इतना कहकर वहा से चले जाते हैं
रत्नाकर जंगल में ही एक वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाता है और राम-राम का जप करना प्रारम्भ करता है , और राम-राम , कब मरा- मरा हो जाता है इसका  भी उन्हें ध्यान नहीं रहता . कई वर्षों तक रत्नाकर तप में लीन रहता है और उसके पूरे शरीर को दीमक मिटटी से धक् देते है किन्तु उनका तप फिर भी भंग नहीं होता .
दीमक को वाल्मीकि भी कहते हैं इसलिए रत्नाकर दीमक की मिटटी से बाह निकले के बाद वाल्मीकि कहलाये .
कठोर तप के पश्चात उन्हें ब्रह्म देव ने दर्शन  दिए और आत्म ज्ञान देने के साथ ही उन्हें राम की कथा लिखने का निर्देश दिया.   

रामायण का लेखन

वाल्मीकि को समझ नहीं रहा था की राम की कथा कैसे लिखें , एक बार वाल्मीकि एक क्रोंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि बहेलिये ने प्रेम-मग्न क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर वाल्मीकि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ा।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥'
हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी। और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।
ऐसा माना जाता है की इस घटना से व्यथित होकर बाल्मीकि ने राम के आदर्श चरित्र की कल्पना की उसके बाद उन्होंने प्रसिद्ध महाकाव्य "रामायण" (जिसे कि "वाल्मीकि रामायण" के नाम से भी जाना जाता है) की रचना की और "आदिकवि वाल्मीकि" के नाम से अमर हो गये।

रामचरित मानस के अनुसार जब राम वाल्मीकि आश्रम आए थे तो वो आदिकवि वाल्मीकि के चरणों में दण्डवत प्रणाम करने के लिए जमीन पर डंडे की भांति लेट गए थे और उनके मुख से निकला था "तुम त्रिकालदर्शी मुनिनाथा, विश्व बिद्र जिमि तुमरे हाथा।" अर्थात आप तीनों लोकों को जानने वाले स्वयं प्रभु हो। ये संसार आपके हाथ में एक बेर के समान प्रतीत होता है।


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